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मुखौटा - 8

मुखौटा पारदर्शी-सा अहसास दिलाता कि मुखौटा है. अलग-सा यही पास लाया था पर अब - दो दिन बाद - कॉल आया, कहा - आम चेहरों के बीच, अपारदर्शी मुखौटों के बीच, असली बचपन मिल पाएगा.

आत्मा

आज भी अचानक हवा चल पड़ती है भर जाता है आँगन पत्तों की सरसराहट से, महक उठता है घर उनकी गंध से. बहुत कमज़ोर हो चला था कभी भी गिर जाता ढा देता घर की छत काटना ही पड़ा उसे साल भर पहले. पर फिर भी कभी कभी जब हवा चलती है अचानक बाहें फैलाए खड़ा हो जाता है वह मेरे आँगन  में,  और व्यापने लगती है  उसके पत्तों की आदिम महक घर भर  में.

सफेदी

कमरे में आया मैं सफ़ेद दीवारें और सफ़ेद हो चली थी- जैसे किलिमंजारो की बर्फ ओढ़ ली हो. वह लेटी थी. जबड़ा हिला हुआ था. शांत तो नहीं लग रही थी. झूठे! वह लेटी थी. जबड़ा हिला हुआ था. शांत तो नहीं लग रही थी. झुका मैं उसका माथा चूमा शीतल, बहुत ठंडा था एकदम ठंडा और कुछ ठंडक अप्राकृतिक ठंडक उसके मिजाज़ से उलटी मुझमें चली आई, बैठ गई पसर कर मेरे पूरे अस्तित्व पर.

गलत नाप

ईश्वर, गलती हो गई आपसे, दुनिया बनाई मेरे लिए पर गलत नाप की, फिट नहीं होती मुझे. जहाँ जकड़ना चाहिए मुझे वहाँ तो बहुत ढीली है, वरना - बहुत ही तंग, बहुत तंग.

थोडा और मैं

मैं अब तक हूँ, आँखों में आँसू हैं मेरी अपनी यादों के कारण, मुझसे कहते हैं ये अभी कुछ और भी है ख़त्म करने के लिए - मारने के लिए.

अफसाना

पानी पर लिखा था एक प्यारा-सा अफसाना, तैर रहा था मैं आँखों में परियाँ भरे, बादल में सर छुपाए घूँट-घूँट कर चांदनी पीते. पर धीमे से आ गई दलदल धंसने लगा मैं नीचे, नीला आसमान घुलने लगा नीली दीवारों से.

कत्तन वाली

धूप से भरी एक बोतल रखी थी इस नीले कमरे के एक कोने में. रोशनी से बुने परदे टंगे थे इसकी दीवारों पर. आज बोतल खाली हुई तो बाहर निकल कर देखा, पर अब कोई टोकरी में ख्वाब लिए इन सडकों पर नहीं फिरता. किससे पूछूँ, कौन लाएगा एक बोतल भर धूप?

कोटिचरण

रीढ़ है और है दिमाग. काली चिकनी त्वचा और काले शहद की खुराक. हाथ हाथ नहीं हैं पर आवाज़ है अलग-अलग तरह की आवाज़ मेल खाती उसकी तेज़ सोच से, और उससे भी तेज़ है चाल- कई सौ पैरों पर- रीढ़ से निकलते कई सौ पैरों पर रेंगते शरीर की.

मुखौटा

कैसे बिना जाने कि एक मुखौटा है छिप भी जाऊं इस चेहरे के पीछे जो तुम सब के साथ मिल बनाया है?

शिलीभूत

रेत पर हमारे जाने के बाद कुछ निशान बाकी थे, आज भी वहीँ सागर किनारे वे निशान दबे होंगे. एक एक परत खुरच कर उन्हें बाहर निकाल पाऊं, या वहीँ, उन दफ़न पलों के साथ मैं भी सो जाऊं.

आदत

बहुत थक गया हूँ, बहुत थका हुआ हूँ - जुराब तक उतार नहीं सकता - ठंड भी आज कुछ ज्यादा है. भूख भी लगी है थोड़ी पर अभी नहीं अभी नहीं छोड़ सकता तुमसे बात करना एक तरफ़ा ही सही पर अभी छोड़ नहीं सकता तुम्हें एसएमएस भेजना भेजना वोइस मेसेज अभी नहीं. बड़ा अजीब लगता है पर फिटिंग भी कि दीवार के पार अकेला तार पहुंचता है शून्य तक.

अँधेरे की सलवट

इस ठन्डे, बर्फीले उत्तर आधुनिक मैदान में बसे हुए कोहरे को थोडा तोड़ो, तो देख सकूँ मैं भी वह जिसका अभिनन्दन कर रहे हैं सब, वह जो रहस्यमय अन्धकार की सलवटों में छिपा है. ओस की बूँदें ढक चुकी हैं वह लहू की लकीर जो दीमक खाने के बदले खिंची थी घास के मैदान पर, और खुरदरे तट पर, खिसकती रेत में बिल्ली का लहुलुहान जबड़ा उभरता है झूमकर, कुछ पल विकृत चेहरों का हमजुबां बन कर.

गूँज - ३

सूरज की पूँछ पकड़ यहाँ ले ही आई तुम घसीटते हुए उसे. पिघलती बर्फ देख मुस्कुराहट खेल गई तुम्हारे होंठों पर, पर नसों में अब भी अटका हुआ है बर्फवाला मौसम, और दौड़ रहा है दिल की ओर.

दीवार - 3

वो रोज़ दिखाते हैं शहर के बाहर बसा कुदरत की गोद में बसा वह मोहल्ला जहाँ पुराने नशेडी बसते हैं- समझदारों की बस्ती से दूर. सोचते हैं यहाँ से निकल मैं वहाँ चला जाऊँगा. जानते नहीं हमजुबां की तलाश में वहाँ भी भटक चुका हूँ मैं. नहीं, मैं तो यहीं बैठ घुटनों पर कलाई रख अपने मूक श्रोता से बतियाऊंगा.

चमत्कार की तलाश

आवाजें किसी भूली हुई भाषा में उठती है मुझमें. एक शब्द तक समझ नहीं पाता मैं उस जानी-पहचानी भाषा का. पर फिर भी कोशिश करता हूँ पहचानने की उन आवाजों के पीछे से झांकते- मेरे डीएनए में बसे- किसी पिछले जनम में छुपे- चेहरे को.

घृणातीत

तो एक और मारा गया वह जानता था , मारा जाएगा, और मारा गया- दिन के उजाले में सब देख लें जिससे. पर उसकी सड़ती लाश आतंकित नहीं करती मुझे, उस पर रेंगते कीड़ों से घृणा नहीं होती मुझे. न ही उसकी गायब होती खाल से न ही पिघलती उसकी अंतड़ियों से . नहीं, उसकी लाश से घृणा नहीं होती मुझे. और न ही उन ऊँचाई पर खड़े पोशाकधारियों से ही कोई घृणा होती है. उनके ऊंचे स्वर- इस मौत का स्वागत करते- डराते नहीं मुझे. इनसे भय खाकर मैं कभी नहीं भागूँगा, एक कदम भी पीछे न लूँगा. जब ये आग उगलते हैं तब उठता धुआं पीकर जो मदहोश हो चिल्लाती भीड़ है, इन्हें घेरे खड़ी भीड़, वह थर्रा देती है मुझे. कांपने लगते हैं मेरे हाथ और डिगने लगते हैं मेरे कदम. इनकी सिली हुई आँखें और झूमते हाथ- थिरकते कदम और कुचले पन्ने- धर्म से प्यार और सत्य से नफरत- इनका नशा और खुले मुंह- इनकी भूख और इनकी खुराक- भर देती हैं मुझे आतंक से. कल तक पहचाने तो जाते थे ये, पर आज कोने में बसी परछाइयों से निकल कर ये मुझ जैसे ही लगते हैं, मेरी माँ, मेरे दोस्तों जैसे, मेरे साथ गपियाने हर नुक्कड़ पर खड़े हम-सफरों जैसे. हाँ, उस सड़ती लाश से घृणा नहीं होती मु

तिनका

इस उथल-पुथल को निचोड़ कर कुछ पल निकालो जहाँ देख सकूँ तुम्हें एक अंतिम बार. इस ठन्डे, बर्फीले मैदान में कुछ सूखी लकड़ियों के जलने की आवाज़ से इस चुप्पी को थोडा तोड़ो. ... --- ...

Help me Dr. Curt Connors!

बाहर खड़ा झांकता हूँ भीतर. हर घडी कोशिश करता तुम्हारी साँसों के उतार-चढ़ाव को, तुम्हारी आँखों में उठते-उतरते रंग को, दौड़ती पुतलियों में थामे सपनों को- कुस्वपनों को, देख पाने की. काश एक छिपकली बन दीवार पर चिपका रह सकता, उन नकली तितलियों के पास, जो रोज़ तुमसे आँखें मिलाती हैं.

अब बस

माँ, यह भी अच्छी नहीं लगी ना तुझे? यह भी ठीक नहीं है ना? जब तक बाहर थी, ठीक थी, पर भीतर आ गई तो गड़बड़ हो गई. कोई नहीं माँ, जल्द ही फिर बाहर हो जाएगी. पर जब कोई और अन्दर आएगी तब यह तो बेहतर नहीं लगने लगेगी ना माँ? कोई पहली बार थोड़े ही हो रहा है इस बार तो ध्यान से देख ले माँ. ना माँ, अब कोई और नहीं आएगा इस कमरे में, अब जो भी दीखता है सब को नापता हूँ पिछले रिश्ते से, और अब हर कोई छोटा पड़ जाता है माँ.

मोलॉक

लगता था मुझे एक छाया जीवी मेरे जरिए यात्रा कर रहा है, बातें करता है मुझसे जुड़ता कभी नहीं किसी से भी. पर अब मैं ही यात्री हूँ और मैं ही वाहन. जब से जाना है आवाजें बंद हो गई हैं, पर अब भी नहीं है कोई लगाव. नहीं जानता अब कैसे दिखाऊँ वह नकली भाव बिना उस आवाज़ के निर्देशन के.

भय

सब सोचते हैं कुछ बना लिया है मैंने. पर दरअसल केवल अपने भय से छुपने के तरीके खोज रहा था मैं.

पठार

खड़े थे सब- गर्व में चूर अपने अपने ढोल और बिगुल लिए, गर्व में चूर, इस पठार पर- कोहरे से ढके, अपने ही प्रकाश में डूबे. तभी एक पल को छँट गया कोहरा, और बंद हो गया वह बैंड, अचंभित- दुर्गम पर्वत-सा देख. फिर, अंधियारी गलियों में टटोलने लगे हाथ, कुछ जाने-पहचाने, कुछ अनजाने, अगला ऊँचा पठार. चमत्कार की तलाश, इंतज़ार. इंतज़ार, धुएं में घिरा, पाउडर से पुता, ब्लीच किया, नकारता (ना, यह न था वह, कुछ और), भटकता (ना, यहाँ नहीं है वह, कहीं और), तोड़ता फोड़ता इंतज़ार. इंतज़ार- फिर दौड़े चेहरे में खून फिर अपने गाल महसूस करें अपनी ही उँगलियों का स्पर्श, फिर बज उठे बिगुल, फिर भूल जाएँ सब उस दुर्गम पर्वत-से को. पर अभी नहीं, अभी तो खोज जारी है, तलाश चल रही है, कुछ और नहीं चाहिए इन्हें- शांत बैठे हैं सब, क्योंकि जारी है तोड़ फोड़ कहीं ओर.

मेरे दोस्त आलू

दीवारों पर जमी काई रोज़ खुरच खुरच कर नमक के साथ उबाल कर पेट भर रहा हूँ, अब आलुओं से दोस्ती जो हो गई है. तुम सब ही की तरह ये भी एक जैसे हैं सारे के सारे मगर अलग होने का ताना कभी कसते नहीं. देखते रहते सदा अनगिनत छोटी आँखों से मुझे पागल समझ फिर भी कभी मुझपर हँसते नहीं.