पोस्ट

अगस्त, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मज़ाक

पंक्तियाँ लिखी जाती हैं पहले बाद में आता है उनमें कोई अर्थ. पहले से मौजूद अर्थों के लिए नहीं लिख सकता एक भी पंक्ति.

क्षितिज खो गया

क्षितिज छिप गया है ऊँचे मकानों के पीछे कहीं, कभी निकला था ढूँढने एक नई दुनिया उसके पार- अब बस देखता रहता हूँ खिड़की से इस मकान की, मकान- जिसकी सफ़ेद दीवारें अजनबी मानती हैं मुझे पर फिर भी जिसे घर कहता हूँ मैं.

डूब

हर रोज़ चार या पांच बार याद आती है वह, और जब नींद नहीं आती किसी रात को तो दस-बारह बार आ जाती है याद. हर याद दो-तीन मिनट की. पहले नापता था हर याद को , गिनता था कितनी देर तक बर्दाश्त कर सकता हूँ उसका चहरा, उसके वाला रंग, उसके दो कंगन, और उसकी आँखें. पर चुरा ली है इन पागलों में से किसी ने मेरी घड़ी . जाने लम्बी हो गई हैं या छोटी उसकी यादें. जब बर्दाश्त नहीं होता और दूर भेज देता हूँ उसे, फिर दीवारों से उड़ जाता है उसके वाला रंग, फिर मुझे देखती हैं नर्स की आँखें- बह जाता है जमे पानी सा नीला रंग उन आँखों का- फिर हो जाती हैं वे काली. सफ़ेद दीवारें, काली आँखें- कुछ उस जैसा नहीं.

कृपा

थक गया हूँ झूलते हुए दो दुनियाओं के बीच, हे प्रभु हमेशा के लिए ख़राब कर दो मेरा दिमाग.

फिर से - 2

हमारी बातों को शब्दों को लग गई है दीमक ख़ामोशी की. उनमें बसा अर्थ उनमें भरा प्रेम धीरे-धीरे रिस गया है, अब केवल खोखल बचे हैं. पर अब भी चाहता हूँ थामना तुम्हारा हाथ, छूना तुम्हारा मन, कहना फिर से...