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एल ज़ोगोएबी

शाम के एक कोने में टेपों से घिरा बैठा था, जाने कितनी सुबहें  इनमें उतरते देखी थीं उसने, जाने कितनी रातें इन्हें जांचते काटी थीं, जाने कब इन्हें सुनते दुगुनी  तेज़ी से बढ़ने लगा, बुढ़ाने लगा. जाने कैसे एक हफ्ते पुराना सन्देश एक साल पुराना हो गया. आज, शाम के इस कोने में, अहसास हुआ - ईश्वर  ज़रूर  नौजवान होगा.
चट्टान पर बैठी चट्टान-से ही रंग की एक छिपकली देख रही थी हमें शांत आँखों से, तैर रहा था कोई सवाल उसकी आँखों में. घर पर उसकी कोई रिश्तेदार गीले फर्श पर फिसल रही थी, जाने कैसे पहुँच गई थी वहाँ - दीवारों और छत को छोड़.

अंतिम छोर पर

सुबह सुबह एक जाना-पहचाना गीत सुन खिड़की से बाहर देखा, देखा एक चिड़िया बैठी है ऐन्टेना पर, अनमनी-सी, गुनगुना तो रही थी - पर कल वाला गीत. उसे देख लगा अब और नए गीत न गाएगी वह. सुबह सुबह खिड़की से बाहर देखा, देखा अपने अंतिम छोर पर पहुँच गई थी प्रकृति. अब नया कुछ बचा नहीं था पास उसके. अमलतास अमलतास तो उग आया था मेरी खिड़की तक अब भी पीले थे फूल उसके, अब भी कीड़ों को भाता शायद, पर मैंने देखा अब बंद कर दिया था उसने पेड़ना. हिचकिचाता बाहर निकला मैं आस लगाए गलत पाने की खुदको. घुटनों पर बैठ कान नीचे लगाया, सुन सकता था मैं उनकी टाप. आ रही थी उनकी फौज, धकेलती, रौंदती, मार्च करती. जुलूस था काले मुखौटों का, सूअर-जैसे मुखौटों का. आज यहाँ पहुंचेंगे वे, आज जीत जाएँगे वे, आज सुरों की सेना का अंत होगा और फिर सब मंगलमय होगा. प्रकृति अटक जाएगी अपने अंतिम छोर पर और सब  फेंक देंगे अपने उपहार उपहार मौत का और 'फ्री-विल' का. अमर हो, सब इंतज़ार करेंगे बदलने का, और कालजयी कुछ भी कभी नहीं रचेगा.

मौसम

कप के निशान का भूत आज भी चाय की टेबल पर वहीँ बैठा है जहाँ तुमने रख छोड़ा था, आज भी भाप में उठती हैं अदरक की तेज गंध, आवाज़ तेल में उतरती पकोड़ियों की.

त्रिकोण

चांदनी में भी खिला एक सफ़ेद कमल, पर प्रतिबिम्ब में उसके एक पीलापन.
कोठरी में बैठे-बैठे क्लौस्ट्रफ़ोबिया हो चला था तो चला आया तुम्हारे पास इलाज के लिए, कुछ वक़्त बिताने खुले आकाश के नीचे चैन की सांसें भरने. पर तुमने दिया मुझे एक गृहयुद्ध. सब बैठे हैं घरों में भविष्य की कल्पना लिए - एक बड़ी छूट, एक बड़े मॉल में, और मैं शस्त्र लिए शास्त्र रटे, चल रहा हूँ तुम्हारे पीछे उसे बनाने को. बनाने - शस्त्र से.

मेघदूत?

उठा खुद को ट्रेन में पाया, तुम से मिला था फिर, रोज़ ही की तरह   पिछले तीन दिनों से. हम बैठे थे मेज पर आमने-सामने, मैं अपनी कॉफी के साथ और  तुम अपना स्कैच पैड लिए. पुराने खंडहरों का स्कैच खींचती सड़क के पार से. अजीब-सा है यह शहर रोज़ चला आता है यहाँ अतीत, वर्तमान से मिलने. और मेज़ पर पड़ी थी एक प्रति मेघदूत की मेरे बनाए नोट्स से भरी. तीन सप्ताह उस शहर में जहां तुमसे मिला एक अरसा पहले. एक अरसा. खुद को देखता हूँ कैफे के बाहर बैठा  - तुम्हारे किसी स्केच की तरह - हाथ में कॉफी लिए, चेहरे तकता  शायद एक तुम्हारा हो इनमें. कुछ पुराने सन्देश पहुँचते है मुझ तक, मेरे भेजे, बचाने को मुझे तड़ी-पार होने से. पर हमेशा देरी से .   सही दूत नहीं न मैं.

गैंग रेप

बस एक ही काम किया था उन सबने प्रेम से मजबूर होकर, बस एक ही - खा लेने का उसे, कुछ ही मिनटों में उसका हर निशान मिट गया - चबा डाला गया. आँखें सिल गई थीं सबकी खुशबू से खिंचे चले आए थे, खुशबू - किसी फ़रिश्ते से उठती, मीठी-मीठी. और फिर, प्रेम कुछ होता ही ऐसा है, मोक्ष जैसा संतोष. ***This is an unnecessary rip-off of Das Parfum by Patrick Süskind. Jean-Baptiste Grenouille makes me write over n over, why to leave out the unnecessary one?