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झंकार

तलवारें टकराई, सब मजाक-सा लगा मुझे वहां बैठ उन्हें देखकर. बेअकल. बेतुका. पर फिर अहसास हुआ - यह हमारे ही पागलपन का आखरी पड़ाव है.

वादी

एक दफा एक जंगल था सुंदरबन जैसा पर कई गुना बड़ा और अनछुआ. मैं वहाँ था, कुछ ढूंढ रहा था, याद नहीं पड़ता क्या. तब वह भीड़ मिली मुझे सब रो रहे थे, मैंने पूछा क्यों, कहने लगे 'हम सब खो गए हैं इस जंगल में, बहुत डर लग रहा है अकेले.'

मज़ाक

पंक्तियाँ लिखी जाती हैं पहले बाद में आता है उनमें कोई अर्थ. पहले से मौजूद अर्थों के लिए नहीं लिख सकता एक भी पंक्ति.

क्षितिज खो गया

क्षितिज छिप गया है ऊँचे मकानों के पीछे कहीं, कभी निकला था ढूँढने एक नई दुनिया उसके पार- अब बस देखता रहता हूँ खिड़की से इस मकान की, मकान- जिसकी सफ़ेद दीवारें अजनबी मानती हैं मुझे पर फिर भी जिसे घर कहता हूँ मैं.

डूब

हर रोज़ चार या पांच बार याद आती है वह, और जब नींद नहीं आती किसी रात को तो दस-बारह बार आ जाती है याद. हर याद दो-तीन मिनट की. पहले नापता था हर याद को , गिनता था कितनी देर तक बर्दाश्त कर सकता हूँ उसका चहरा, उसके वाला रंग, उसके दो कंगन, और उसकी आँखें. पर चुरा ली है इन पागलों में से किसी ने मेरी घड़ी . जाने लम्बी हो गई हैं या छोटी उसकी यादें. जब बर्दाश्त नहीं होता और दूर भेज देता हूँ उसे, फिर दीवारों से उड़ जाता है उसके वाला रंग, फिर मुझे देखती हैं नर्स की आँखें- बह जाता है जमे पानी सा नीला रंग उन आँखों का- फिर हो जाती हैं वे काली. सफ़ेद दीवारें, काली आँखें- कुछ उस जैसा नहीं.

कृपा

थक गया हूँ झूलते हुए दो दुनियाओं के बीच, हे प्रभु हमेशा के लिए ख़राब कर दो मेरा दिमाग.

फिर से - 2

हमारी बातों को शब्दों को लग गई है दीमक ख़ामोशी की. उनमें बसा अर्थ उनमें भरा प्रेम धीरे-धीरे रिस गया है, अब केवल खोखल बचे हैं. पर अब भी चाहता हूँ थामना तुम्हारा हाथ, छूना तुम्हारा मन, कहना फिर से...

आप्लावन टैंक

जादुई इस कमरे में मेरी बनाई दुनिया है- एक तस्वीर उस दुनिया की जो बाहर खड़ी है. कभी खिड़की से झांकती है तो कभी किवाड़ खोल अन्दर ही घुस आती है, थोडा बदलना पड़ता है फिर अपनी तस्वीर को थोडा रंगना पड़ता है दुनिया को.

अलगाव

सपना एक ऐसे घर का जहाँ केवल वे आएं जिन्हें मैं बुलाऊं, बड़ा, चोटी पर और मेरा. पूरा हो ही जाता हैं यह सपना, जिसने भी देखा पा लिया. और फिर जुड़ने की कोशिश में तोड़ दिया वह मकान अपने ही सपनों का.

नाटा उत्सव

उदास था वह दिन पर हंस रहे थे हम सब, दिन भर. गर्म चावलों से उठती गंध से खिड़की पर आती धूप के स्वाद से आसमान पर पड़ी दरार पर अटके पड़े ध्रुव पर खुद पर हंस रहे थे हम दिन भर. उदास था वह दिन.

हाला

क्षितिज तक बिछी है सफ़ेद बर्फ की चादर, और चला आ रहा है काली हाला लिए एक दलाल. तलवे दुखाने से बहुत बेहतर है तकियों पर पसर कर प्यास बुझाना.

परिचय

यही शहर था पर अनजाना-सा, अजनबियों से भरा. हाँ, यही शहर था पर गलियाँ कोई और थीं रास्ते चले जा रहे थे किन्हीं अँधेरे कोनों में. दूर खिसकती गईं पंक्तियाँ, धँस गए कहीं शब्द, बस रह गईं - दीवारों पर सिर पटकती, किवाड़ खटखटाती, खिड़कियाँ टटोलती, गूँजती आवाजें.

मनोरंजन

सुबह-सुबह आँख भी अभी खुली नहीं थी पूरी पर खड़ा था वह पानी, गिलास और कुप्पी लिए, आँख भी अभी खुली नहीं थी पूरी रेल के किनारे. आस पास उसके उछल रहे थे कुछ बंदर. अचानक बजाने लगा वह कुप्पी से गिलास, पर ध्यान किसी का भी उस बच्चे पर गया नहीं, हाँ, कुछ लोग खिलाने लगे रोटी बंदरों को.

विरेचन

सो रहा था वह प्लेटफार्म पर, अचानक हिचकी उठी आँख खोल सामने खिसका उल्टी की अपने ही पैरों पर, दाढ़ी से भी टपक रही थी कै. पैरों के निशान छोड़ता फिर वहीँ पीछे खिसक सो गया.

सुश्री. आत्मसंहार

प्रेम प्रतिरोध एक नाकाम प्रतिरोध. आज भी तैर रहे हैं तुम्हारी आँखों में भूत जो भगा नहीं सका मैं, एक बोतल का भूत जो टूटी नहीं, एक रिश्ते का भूत जो जुड़ा नहीं. एक लाश और एक आशंकित चेहरा. मेरे हाथों में चरमराकर बिखर गया गुलाब की पंखुड़ी-सा.

सपना

सपनों की भीड़ में अपना समझ बैठा था किसी गलत सपने को. अगर मेरा होता, मिल ही गया होता अब तक एक छोर तो कम-से-कम. खोज जारी है घूमती दुनिया में मेरे असली सपने की. जाने किस कोने में छिपा बैठा है वह.

जड़ें

आज रात तुम और मैं उड़ चलेंगे दूर, फिर कभी न देखेंगे पीछे मुड़कर. इस कल से उड़ चलेंगे हम बहुत दूर. और तेज़ इतना तेज़ धुंधला जाएगा सब. चाहे वे रोकें, कुछ भी कहें जला देंगे हम सब रास्ते, सब पुल. ... एक पत्र- घर तुम्हारे बचपन का बिकने वाला है अब. इच्छा हो तो आ कर देख लो एक आखिरी बार. ... छत पर बना वह अकेला कमरा आज भी है वैसा ही, सबसे ऊपर और सबसे शांत, सामने उसके टंकी भी है वही पुरानी- कभी टुकड़ों में बँटा बाथरूम (जो आज भी बँटा है, वहीँ नीचे) नहीं मिलता था तो यहीं नहाते थे हम. सब है वैसा ही बस कोई स्पर्श, कोई छुअन नहीं. नीचे वही लाल ईटों का बरामदा है और वही दरारें है, खाटों पर बिछी माँ की सुनाई कुछ यादें है, पर मेरी अपनी कोई नहीं. ... अर्थहीन ही है अब बचपन का घर वहाँ पला-बढ़ा बचपन, खोया हुआ बचपन. हाँ, अब जो रहते हैं वहाँ उनका बनाया डाक टिकटों का संकलन बहुत प्यारा है, और उनका गर्व अपने संकलन पर- बच्चों जैसा.

बहाना

दराज़ में दुबके वे दो कंगन, काली स्याही में डूबी वह कमीज़, अँधेरे कोने में छिपी बारिश की दो बूँदें- बाहर आ गए आज कला और कथा के बहाने. अच्छा है... हमारे बीच के फासलों को रोशनी से भरने के लिए जला लिया है सारा घर.

कुलस्यार्थे त्यजेदेकं

कतई सरल नहीं वध करना- अत्यंत आवश्यक है पवित्र होना, निरपराध होना - अबोध होना. जानना कि मृत है वह पहले ही. छोटी-सी भी शंका के लिए कोई स्थान नहीं यहाँ- कोई रिक्तता नहीं. सिर रख उसके कंधे पर घंटों रोया था, वह भी बाहों में भर बहुत भावुक हुई. स्वाभाविक भोलापन हमारा निखर रहा था तब- विरासत में मिला था कवि पिता से, कभी. ... प्रेम- खिली धूप सा आनंद आसमानी रंग लिए अपराध-बोध. ... संभवतः एक कदम तक बढ़ा न पाऊँ बिना सहारे, तख्ते से बंध कर ही खड़ा हो पाऊँ मैं पाश के नीचे. परन्तु, झूलूँगा जब शुद्धि कर लेने का संतोष रहेगा. और खेद तुम्हारे द्रोह पर.

विसंवाद

भित्ति-चित्र- मेज़ पर बैठ कोई चिट्ठी पढ़ रहा था, मग रखा था पास ही, पहली दो-तीन पंक्तियाँ दीख रही थीं जाने किस भाषा में- उतार ली मैंने नैपकिन पर. ... आँख खुली. आवाज़ बंद थी, टीवी पर कोई बाबा योग सिखा रहे थे. मुँह फेर फिर सो गया. ... लाल प्रकाश से भरा एज़्टेक का पिरामिड. कॉफ़ी पी रहे थे हम नीचे बैठ. शोर भरा था बीच पर चुप थे हम दोनों. चौरासी हज़ार गुलामों की बलि पर कोई शोर नहीं यहाँ. केवल प्रकाश, लाल प्रकाश और लाल छाया-आकृतियाँ. ... आँख खुली. आवाज़ बंद थी, टीवी पर एक कवि का खून बह रहा था - कुछ पल्ले नहीं पड़ा. मुँह फेर फिर सो गया. ... कुछ बात कर रहे थे चार धुंधले चेहरे- सुन नहीं पा रहा था मैं. पर कोई बहुत बड़ा डर हावी था उन पर. पास गया- सुन रखी थी पहले भी उनकी सारी बातें, पर कहाँ, याद नहीं अब. ... आँख खुली. आवाज़ बंद थी- और तस्वीर भी. न तो वे चहरे, न उनकी आवाजें, न बातें ही याद रहीं- पर डर अभी बाकी है. ... कोने में बैठ गपियाने लगा एक चूहा घुस आया था जाने कहाँ से- पाताल में ऊपर देखो कोई ढक्कन खुला हो अगर सदा तारे दीखते हैं- खाने को खूब मांस मिलता है, अजब कसाई रहते हैं यहाँ ऊपर काटते हैं, ह...