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जुलाई, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बेनकाब

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खिड़की, अंदर आती धूप, और बेतहाशा गर्मी. धीरे धीरे खिड़की पर उग आए पौधे, छन-छन के आती धूप, रोशनी, सिर्फ रोशनी, गर्मी बिलकुल नहीं. धीरे-धीरे ढक गई पूरी खिड़की, खिड़की से ही लौटने लगी रोशनी भी. काट डाले वे पौधे. खिड़की, अंदर आती धूप, और बेतहाशा गर्मी.

ग्नोम*

तुम अपनी आँखों के पीछे से झाँक कर देखती हो मेरे अनुभव. आज तुम खुश हो, आज नाखुश, आज यादों में डूबी, आज सपनों में. आज गुलाबी है चश्मा, आज है काला. तुम अपनी आँखों के पीछे से झाँक कर देखती हो मेरे अनुभव. और खोलना चाहता हूँ उन्हें, दिखाना चाहता हूँ तुम्हें, पर आज तुम खुश हो, आज नाखुश, आज यादों में डूबी हो, तो आज सपनों में. परत दर परत चीरती गईं तुम हर आवरण, और जो बचा छोटा-सा ग्नोम उसे देखना, उससे बात करना, उसे सँवारना, उसे महसूस करना, रंगीन चश्मों के पीछे छुपी आँखों के पीछे से अनचाहा-सा हो गया. सुना था कभी मैंने कि कह दो तो झूठ हो जाता है प्यार, पर ना कहो तो भी कहीं खो जाता है प्यार. *A gnome is a mythical creature characterized by its extremely small size and subterranean lifestyle. comes from genomos "earth-dweller"

गर्भ में

आम-सा दिन था रोज़-सी हवा चल रही थी हमेशा-सी पत्तों की आवाजें, चलते-चलते अचानक पेट फटने को हुआ लेट गया वहीँ लिपट कर भ्रूण की तरह. एक कुआँ झाँकने लगा मुझ में, आकाश से, दर्द के मारे ठिठुर रहा था मैं, हिल नहीं पा रहा था. वह कुआँ खींचने लगा मुझे अपनी ओर, अपने गर्भ की ओर, और उड़ चला मैं. अँधेरा छाता रहा, गर्माहट आती रही, और मैं छुप गया उस गर्भ में, सुरक्षित पूरी तरह से.

फ्री-विल

सागर में गिरती बूँद, तपते तवे पर गिरती बूँद, रेत में गिरती बूँद, खेत में गिरती बूँद, सीप में जाती बूँद, बूँद... बूँद... बूँद... आखिर हैं तो सब बूँद ही! अपनी-अपनी किस्मत में कैद.