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गर्माहट 2

कुछ गर्माहट आ गई थी मेरी कविता में, रातभर कोई सोया था तकिए में उसे छुपाए।

काग-डरावा

(मूल: DIE VOGELSCHEUCHEN, Gunter Grass) नहीं जानता मैं कि ज़मीन खरीदकर जंग लगे तारों में उसे बांधकर रेत में कुछ झाड़ियाँ उगाकर उसे बगीचा कहा जा सकता है क्या नहीं जानता मैं कि सारिकाएँ क्या सोचती हैं फड़फड़ाकर उठती हैं, बिखरती हैं, मेरी दोपहरी पर छीटें मार कर यों उड़ती हैं जैसे डरती हों जैसे काग-डरावा सचमुच डरावा हो और पर्दों में बंदूकें हों नालियों में बिल्लियाँ. नहीं जानता मैं कि पुरानी जैकेट और पतलूनों की जेबें हमारे बारे में क्या जानती हैं नहीं जानता टोपियों में क्या पल रहा है किन विचारों के लिए कुछ सेआ जा रहा हैं पंख उगा रहा है और डर कर न भागेगा भले ही बिजूका भी खड़े हों हमें बचाने को. बिजूके दूध पीते हैं क्या? वंशबेल बढ़ गई है उनकी रातभर टोपियाँ बदल बदल कर अब तीन खड़े हैं मेरे बगीचे में अदब से कोर्निस करते, घूम कर, सूरज को आँख मारते, और बतियाते; बतियाते बंदगोभी से.

चाँद

अपने जबड़ों में दबाए सागर तले कहीं मगर बैठा था, ज़ोर कुछ ज्यादा था जड़ों से खून निकल आया. अब की बार चाँद लाल था.

सार

पटरियाँ हैं रेल की, घर से कुछ ही दूर सड़क के ठीक ऊपर। कोई मिलता है मुझे हर रोज़ खड़ा वहां पटरियों को देखता चढ़ने को तैयार। मैं भी रुका वहां ज़िप खोले कुछ देर फिर चढ़ने लगा दीवार न जाने किस पार।

तहखाने

तहखानों के दरवाज़ों पर ऊंचे ऊंचे घर घरों में लोरियाँ दीवारों से आती आवाज़ों पर चूहों की। चूहों की आवाज़ें नाखूनों की आवाज़ें दीवार खुरचती दरवाज़े नहीं।