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हूँ - 7

तंतु सारे लपेट लिए अपने शरीर पर और चमड़े के परों से ढक लिए सब इस दुनिया से दूर. बाहर से देखने पर चमड़े की एक गेंद बस, बहुत बड़ी, निर्जीव, कभी कोई आएगा एक चाक़ू लिए और कुरेदेगा मेरे पंख तब भूख मिटेगी मेरी.

एक ख्वाब सा देखा है - 2

आँतों में, जहाँ खाना पचता है, कोई जन्मा था. वहाँ से रगों में घुस गया, दौड़ लगाने लगा शरीर भर में. जिद्द थी उसे धूप देखने की, त्वचा तक पहुंचना चाहता था. लाल प्रकाश में घिरा लड़ता रहता लगातार श्वेत रक्त कोशिकाओं से, फुरसत मिलती कभी तो नोचने लगता रास्ता पर कोई लहर खून की जल्द बहा ले जाती उसे. लड़ते लड़ते एक दिन आँख तक आ गया वह, भयानक डांट के बीच बह निकला चुपचाप गुलाबी कर दी दुनिया सारी बस कुछ क्षण ही.

भूखों मरे

2008 में, कश्मीर के चिड़ियाघर में शेरों को खाना मिल नहीं रहा था, आज कानपूर में भी नहीं मिल रहा. यह कविता-सी तब लिखी थी. कल अगर भूखों मरे हम तो पहले मरनेवाले को बाकी खा लें तो अच्छा हो! ज्यादा सोचना मत, वरना शव भक्षी मकोड़े खा जायेंगे! वैसे मेरे कूल्हे का कटलेट अच्छा बनेगा, लाल, टपकता तेल, प्लेट पर सजा. पर काटते वक्त ज्यादा खून बहे, तो जानलेना- अभी जिंदा हूँ! बेहोश... याद रखना कोई आने वाला नहीं एक चाबी लिए देने तुम्हें जिससे सब खुल जाए! कोई हल नहीं. कल तुम कितना चिल्लाए थे, किसी ने सुना था क्या? आज भी न सुनेगा? पर कल तो आयेगा!

सबसे ख़तरनाक

काले पड़ते नाखूनों होठों से झड़ती पपड़ियों पीली आँखों सूखे पत्तों से जर-जर शरीर के पीछे कहीं उठ रही है एक कीट चेतना. मुर्दा सपनों पर नाचती अमरत्व की प्यासी अपने नहीं, उत्क्रांति के; तलाश में दौड़ती रानी-कीट की सार बतलाने उसे बस चुप्पी में जकड़ मुर्दा शान्ति से भरने से पहले.

बिन आए न रहे

यों आती है मुझ तक चल कर मृत्यु जैसे प्रेमिका आती थी कभी नींद से जगाने, एक चुम्बन से.

होलिका दहन

इतना कुछ जला लिया है हमने डर के निशाचरों से कि अधिक उज्वल हैं बादलों वाली रातें पूरे चाँद की रातों से. (पूरा चाँद निकला है आज, जाने कौन जला है.)

लम्बी ज़िन्दगी

बाहर वहाँ, सड़क पर, है कुत्ते जो खाते है मनुष्य. सुरक्षित नहीं वहां निकलना, छोटे समूहों में भी, क्योंकि झुण्ड में शिकार पसंद है उन्हें. हाँ, अगर आपके पास बन्दूक हो तो अलग बात हैं, पर मनुष्यों के लिए प्रतिबंधित है बंदूक रखना. बंदूक रखना प्रतिबंधित है क्योंकि बन्दूक हो तो मनुष्य मरते हैं बहुत. उन्हें लगता है कि उनके पास बंदूक है तो वे अपने स्वामी से लड़ सकते हैं. पर बंदूक से बहुत बढ़कर है उनके स्वामीयों के पास और मनुष्य चिन्हित बस्तियों में रहते हैं. वह रहते हैं क्योंकि हमारे बच्चे उनमें पनपते हैं, वे सबसे अच्छे माध्यम हैं. इससे पहले कि बच्चे उन्हें खा के बाहर निकले, हम उन्हें मृत मवेशियों में स्थानांतरित कर देते हैं. पर वे अब मवेशियों में पनप नहीं पाते, मवेशी अब प्रतिरोधक हो गए हैं. मनुष्य अपने गृह पर परजीवी से थे, पर हम यहाँ उनके सहजीवी हैं. वे खुश हैं, उनकी सडकों की सुरक्षा कुत्ते करते हैं, उनके घर बिजली के तारों में सुरक्षित हैं. वे स्वतंत्र हैं, और उत्पादक भी. पशु पालते हैं, और उनका व्यापार करते हैं. और लम्बी ज़िन्दगी जीते हैं.

कार

इमेज
पिछले सप्ताह जब मिले थे वह और उसकी माँ गर्व था उस पर उन्हें नई कमीज़ भी दिलाई थी विशिष्ट कार्यों के कारण मगर असंतुलित हो चला था वह कभी भी फट सकता था या उड़ सकता था हवा में राकेट की तरह. अब तक तो कार भी नहीं थी उनके पास.

परी - 3

बस वही याद है जो परी ने बताया है रोज़ कहती है सब आ जाएगा धीरे धीरे उसके अलावा कोई नहीं आता मुझसे मिलने बस इतना ही भरोसा है कि चीज़ें तोडनी आती थी मुझे और कभी एक बार खाया था मैंने एक गुलाबी बच्चा कोई क्यों खाएगा एक गुलाबी बच्चा? परी से पूछता हूँ तो तारे से छूकर सुला देती है कहती है सब आ जाएगा धीरे धीरे.

परी - 2

चीज़ें तोडनी आती थी मुझे और एक गुलाबी बच्चा कोई क्यों खाएगा बस इतना ही भरोसा है कि एक गुलाबी बच्चा? परी से पूछता कभी एक बार खाया था मैंने सब आ जाएगा धीरे धीरे उसके अलावा कोई नहीं आता मुझसे मिलने बस वही याद है जो परी देती है कहती है सब आ हूँ तो तारे से छूकर सुला ने बताया है रोज़ कहती है.

होली

रेत झड़ती है मेरी आखों से जंग खाने लगा है नसों में दौड़ता खून और पथराने लगे हैं होंठ इस होली पानी न डालना मुझपर कीचड बन दाग छोड़ जाऊँगा.   

पंक्तियाँ - 2

छोटा हो गया है.           पंक्तियाँ मिट गए    हैं, कोरे   हो रहें           हैं   कहानी, उपन्यास, नाटक, गीत खोकला           हो चला हो चला हो रहे हैं. रघुवंश छोटा हो चला हो गया है. न अकविताएं मर रही     है, न तेवरी जीवित है. न अकविता रही है, न तेवरी जीवित है.         न अकविताएं मर रही हैं.       रघुवंश छोटा हो           रहे हैं पैटी स्मिथ और बाणभट्ट के शब्द खोए हैं. रघुवंश छोटा हो गया है और   बाणभट्ट के शब्द खोए हैं कागज़. क्तियाँ मिट गए हैं. रघुवंश छोटा हो गया है           और बाणभट्ट     के        आखरी पन्ने मिट गए हैं, कोरे हो गया है       और बाणभट्ट      के आखरी पन्ने मिट गए    हैं,      कोरे हो गया है.         न अकविता रही है, न तेवरी जीवित है.       पंक्तियाँ मिट           गए हैं कागज़. ुवंश छोटा हो चला हो चला एक एक कर मरते, तड़पते बदकिस्मतों को न देखने की क्षमता की कीमत तो चुकानी ही थी. कुछ नया आया, पुराने को मिटाने अब नया ना जाने कब आएगा, आएगा भी या नहीं.

सोफ़िया-३१ / अपराध

बाँध टूटा था कहीं तेज़ी से बहा था समय लहरें उठी थीं और उनकी परछाइयाँ खड़ी थीं सोफ़िया के होठों, आखों को घेरे. सोचता हूँ कह ही दूँ क्या हुआ गर वह ना कहेगी? कोई चाहता है उसे यह जानकर क्या बुरा होगा भला? पर लगता है वह देखेगी मुझे दया भर अपनी आखों में बिना कहे ही कहेगी - क्यों लाद रहे हो मुझपर?
ऊँचे आसमानों से तुम यहाँ आ गिरे हो लुडकते लुडकते. स्वाभाविक है, रोते हो. पर जानोगे एक दिन तुम उस माँ को जो ले आई है तुम्हें यहाँ, और हँसोगे उसके साथ पगलाती दुनिया पर.