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बोलो तो

कुछ शब्द, सहमे सहमे से खामोश बैठे हैं इंतज़ार में तुम्हें सुनने के.

तर्क के पार

अब काटने दो मुझे अपने तर्क. तुम रख लो मेरी सोच, मेरा सब कुछ. बदले में बस एक बार करने दो मुझे विश्वास.

संस्कार

दरवाज़े पर वह खड़ा था सफ़ेद बाल, मोटी भौंहें, चेहरे  पर झुर्रियाँ - हर एक में सोए कई सौ विचार, यह  वही था जो कुछ चालीस साल पहले मर चुका  था - पर अब तक इसका शरीर ज़रा भी नहीं गला था, ठुड्डीउठाए खड़ा था. उसके गिरते ही एक रणसिंगा गूँज उठा और एक विशालकाय घूँसे ने एक ही प्रहार से पूरा मंदिर ढा दिया.

तीमारदारी

तुम, खट्टे दूध की गंध लिए (अभी पिया जा सकता है), सोते हुए भी रह रह कर सिहर उठतीं. मैंने खुद को जगाए रखा, कभी तुम्हें सहलाया, कभी पाँव दबाए, फिर भी जाने कब आँख लग गई. तुम बैठी हुई थीं कोई बुरा सपना था शायद. पर मुझमें गर्माहट भरी थी - बस, अब गायब न हो जाना तुम - काश, तुम बस मेरी दुनिया में बसती, कहीं और जाना न होता तुम्हें, बस इस कमरे में बंद, मेरे साथ. - कैद थी मैं कहीं, दम घुट रहा था. - कोई नहीं, बस सपना था, कुछ देर और सो लो अभी बुखार टूटा नहीं है. -

वे सफ़ेद फूल,तुम और मैं

याद है तुम्हें शहर भर घूमें थे हम कुछ सफ़ेद फूलों की तलाश में, मिले नहीं थे हमें. नाराज़ थीं तुम, खुद से - कि ला नहीं पाई वे सफ़ेद फूल. नाराज़ थीं तुम - कि लाने पड़ रहे थे तुम्हें वे फूल, कि आज ही के दिन कई साल पहले तुम रो तक नहीं पाई थी, कि कहना पड़ा था तुम्हें 'अब रो लो'. उस दिन बहुत डर गया था मैं, आज तक दुबककर बैठा है मुझमें वह डर, कि बस यूँ ही, एक दिन, नाराज़ हो जाओगी तुम मुझसे भी, अकारण. और सज़ा दोगी किसी और को.

बस दो ही दिन

बस दो ही दिन हुए थे और तुमने लौट जाना चाहा, मैं नहीं जानता था क्यों पर यह तो होना ही था. सोचा था मैंने कुछ और समय लगेगा अभी कम से कम एक हफ्ता - और उस समय में बंध जाओगी तुम. पर बस दो ही दिन...

खिड़की से

गलत जगह ले लिया है कमरा जब भी बाहर देखता हूँ इस खिड़की से बस दूर जाती नदी दीखती है ले जाते हुए अपने साथ जाने क्या क्या. जाने कितना कुछ है मेरे पास हर रोज़ ले जाती है फिर भी कुछ छूट जाता है पीछे. पहले एक पतंग अटकी थी नीली पूँछ वाली सामने ऐन्टेना में आज़ादी को जूझती जाने कब उड़ गई वह भी, बहुत याद आती है. रोज़ मेरे देखते ही देखते सूरज दुबक जाता है और रात आ जाती है, पर चाँद, चाँद बड़ी देर से आता है मेरे आसमान पर, कई बार तो उसकी राह तकते आँख लग जाती है, हँसके कहता है और भी हैं चाहने वाले उसके हमसे तो रोज़ ही मुलाक़ात होती है - यह भी ठीक है वरना चाँद से भी बोरियत हो चली थी.

संश्लेष

शाम ढले अचानक तेज़ प्रकाश उठा पूरब की ओर से. देखा एक वृक्ष उग रहा था, विशालकाय, कई कई वर्षों का सफ़र कुछ पलों में तय करता, एक विशाल वृक्ष चमकदार धुएँ का. देखते ही देखते विलीन हो गया नीले आसमान में, बस एक लकीर-सी छुट गई पीछे काली लकीर - दरार पड़ी हो जैसे, जैसे एक दूसरी दुनिया टकरा गई हो मेरी इस दुनिया से, और मौल गई हो चूड़ी आसमान की.  कुछ चौड़ी हुई दरार दांयाँ बाएँ से छूट गया. ओवरलैप ख़त्म . फिर, तुम और मैं तीर्थयात्रा छोड़ अपनी अपनी एल्बम देखने लगे आसुओं को रोकते.