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नवंबर, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रीति-भीति

तैर रहा था मैं हवा में, थकने लगा था ऊँची पहाड़ी पर चढ़ते हुए. ऊपर उड़ती हुई एक चट्टान दिखी, पास पहुंचा गुफा थी भीतर, समुद्र की आवाजें कैद थी उसमें. दियों से सजी सीढ़ियों से नीचे उतरा एक बड़ा लिंग था बड़ी सी एकलौती आँख से मुझे घूरता हुआ. लगा निगल ही जाएगा मुझे. बाद में हिम्मत ही नहीं हुई बताने की, किसीको भी.

हाथ के निशान

बाग़ था एक, न, बाग़ नहीं था, बस कुछ पौधे उग आए थे बाहरी दीवार से बाहर, कुछ छोटी-छोटी तितलियाँ उड़ आतीं कभी कभी गिरगिट तो कभी गिलहरी भी दिख जाती, बारिश में तो मेंढक भी दिखते. और तुम कभी-कभी रुककर जाली लगी खिड़की पर उस बाग़ को देखतीं. जब बीमार हुईं घंटों खिड़की के पास अपनी ख़ास कुर्सी पर बैठ देखती रहतीं. फिर बिस्तर पकड़ लिया, सोचा, कुछ सँवार दूँ बाग़ को, उठकर जब देखोगी अच्छा लगेगा. घंटों बिताए, लगा, जितनी जल्दी हो जाएगा, उतनी ही जल्दी उठ पड़ोगी तुम. पर उठी नहीं तुम कभी. सोचा कैसा लगता तुम्हें, खिड़की से बाहर देखा, कुछ नहीं था वहां, थे बस मेरे हाथों के निशान, लगा, देर से होता, तो शायद देर से उठतीं तुम.

नारियल के पेड़ से...

अपने जीवन के पचास साल दिए तुम्हें, पंद्रह की उम्र से हर महीने हर पेड़ से चालीस नारियल उतारे, फिर भी आज गिरा दिया मुझे, दस फीट नीचे. कमर तो तोड़ी ही कुछ हड्डियाँ भी साथ ही. झोपड़ी में तुम्हारे पत्तों से ढकी, बिस्तर पर पड़ा इंतज़ार में हूँ अपनी लाचारी से आज़ादी के, अपने पिता की तरह तीस साल पहले. मेरे पास, बचपन से ही, कुछ नहीं था- तुम्हारे सिवा. पर मेरे बच्चे कभी तुम्हारी ओर रुख नहीं करेंगे. ***Off the topic, Coconut Development Board is looking for a new logo, if anyone has ideas....

भीगी रेत पर

इमेज
रेत पर लकीरें खींच बनाई थी कमरे की खिड़की वहाँ खड़े हम, बरसता पानी, ख़ुशी से उछलती बूँदें मैच जीतकर आए बच्चों की तरह. पाँव पटकती लहरों ने धो दिया सब. पाँव रह गए हमारे रेत में धंसे, दूर जाते कदमों के निशान रेत की परतों के बीच संचित होगए सदा के लिए. ***Image from RDS

मत्स्य-वेध

नाव में लेटे, चाँद को देखते, इंतज़ार करते मछलियों के काटने का, आधी रात गए प्यार... समुद्र सा नीला आकाश लहराता रहा, उफनते बादलों के बीच. धनुष लिए एक ओर खडा मैं, बाणों में सजी जाने कितनी मछलियाँ, भाले भी कुछ कछुओं की पीठों पर. अपने द्वीप पर खड़े तुम धिक्कारते मुझे ढेर सी मछलियों को अपनी ओर आते देख.

One for the Mumbai Road

(In fond memory of 26/11 and all that Mumbai doesn't stand for) शीशे सारे चढ़े हुए थे, दूसरी सीट पर रखा मेरा फ़ोन बज उठा, उठाने को झुका जोर का झटका लगा, सिर भी छत से टकरा गया. थोडा संभला, गाड़ी रोक कर सिर में दर्द था, आँख में उतर आई थी एक बूँद खून की, गुलाबी दिखने लगी हर चीज़, हर ओर. गुलाबी चश्मा चढा हो जैसे. कॉलर ठीक कर आगे बढ़ चला. कुछ आगे उल्टी रोकी न गई, गाडी से उतरा ही था बारिश होने लगी, उछलने लगी बूंदे, छींटे मारने लगी, हाथ-पाँव उग आए हों जैसे. धोने लगी पूरा रास्ता, मिटाने लगी सारे निशान मेरी गाडी से. उठा ले गई मुझे, दूर उस घटना से जो जाने कब घटी थी, शायद किसी भूले सपने में हाँ, सपना था शायद, सपना ही तो था.

Fatal Familial Insomnia

वह हमेशा पड़ी रहती बिस्तर पर, पर कहती निद्राभाव है! मैंने देखा फिर आँखें उसकी सदा रहती अधखुली. रातों को उठकर सवारती अपने केश, लगाती बटन, लगता जागी है, पर अटक गई थी किसी सेतु पर दो दुनियाओं के बीच जागने लगे उसमे, कुछ भय, दिखने लगे जाने कौन, और वह सदा दूर निद्रा से. बंद हो गया फिर बात तक करना, बंद हो गया रातों को उठना, हमेशा बिस्तर पर, आँखें खोले. उसका मस्तिष्क घुल रहा है किसी पिलपिले तत्व में. देख रहा हूँ मैं असहाय तड़पते उसे ... अचानक! ** Making an entry here everyday doesn't look like one of my better decision. I had taken it as my output had drastically slowed down. Now, after 3 weeks, I have reshaped as a post every Sunday. Hope that be better. The trouble is I feel I have exhausted everything I wanted to write about within first few months after I started out.

प्रेम

रेंगते हुए घुस जाने दो मुझे चूल्हे में, तपने दो मुझे. फिर से न खोजना चाहूँ वह गुफा दूर करने के लिए यह ठण्ड.

घर

कपडों से रंग की तरह उड़ रहा हूँ मैं धीरे-धीरे. उड़ रहा हूँ, उड़ता जा रहा हूँ... धीरे-धीरे... धीरे-धीरे... अब और रुकना चाहता नहीं यहाँ नहीं चाहता इसीलिए उड़ रहा हूँ धीरे-धीरे... अब तो दिखने लगा है मेरे पार, ध्यान से देखो कुछ विकृत हो जाता है मुझसे गुज़रकर. पर बहुत थोडा सा. और हर सुबह यहीं पाता हूँ खुदको, खड़े होने की कोशिश करता- मेरी आँखों में भरी इस जगह की परछाइयाँ रोकती हैं मेरा रास्ता.

पंख

कभी कभी जब आंसू भर आते थे, मुझे गिरता देख, उनके संग, तुम दे देते थे पंख, उड़ा ले चले थे अपने संग, पर उड़ता देख मुझे भय भर आया तुममें, जाने कहाँ छुपा बैठा था वह. और अब रेलिंग पर पंजे टिकाए, बाहें फैलाए, पूरा बल लगा सोच रही हूँ, जल्द ही पंख उग आएंगे, शायद. प्रतीक्षा में हूँ.