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एड्ना लिएबेर्मन का भूत

[मूल: Roberto Bolano, El Fantasma de Edna Lieberman] सबसे काली घड़ियों में आती हैं तुमसे मिलने वे तमाम मुहब्बतें जो खो गई थीं. पागलखाने तक जाने वाली पगडण्डी बिछने लगती है जैसे बिछती थीं आँखें एड्ना लिएबेर्मन की, बस उसी की आँखें जो शहरों की छतों से ऊंची उठकर चमक सकती थीं. और वे फिर चमक रहीं हैं तुम्हारे लिए, एड्ना की आँखें, पीछे उस अग्निवलय के जो पगडण्डी हुआ करता था, रातों को तुम जिसकी परिक्रमा करते थे., बार बार, खोज में उसकी या शायद अपनी परछाईं की और तुम जागते हो, शांत, और एड्ना की आँखें हैं वहीँ चंद्रमा और अग्निवलय के बीच अपने मनपसंद मेक्सिकन कवियों को पढ़ती. और गिलबेर्तो ओवेन? पढ़ा है उसे तुमने? बिना आवाज़ ही तुम्हारे होंठ कह उठते हैं, कह उठती हैं तुम्हारी साँसें और तुम्हारा खून जो दौड़ रहा है प्रकाशस्तंभ के किरणपुंज की तरह.

गुड़िया-सी

धरती का सीना चीर कर ले आया था वह मुझे अपने घर। मेरे कपडे गलने लगे थे गुड़िया-सा सजाया था उसने अपनी पसंदीदा कमीज में। मेरा क्या है, पर वह खुश था कुर्सी पर बिठाया, मेज़ सजाई गुड़ियों की पार्टी में चाय पिलाई। गाढ़ी लाल चाय जाने कहाँ से लाया था रोज़ पिलाता और खुश होता गोद में उठाकर नाचता एक तरफ को लुढ़का मेरा सिर कुछ दुखता पर मेरा क्या है, बस वह तो खुश था। थर्मस से निकले खून का स्वाद रोज़ अलग होता कभी डर का, कभी उम्मीद का तो कभी अधपके सपनों का। उसकी माँ ने देख लिया था मुझे आज प्रेम चखा मैंने भर गई मुझमें तवे से उतरी रोटियों की गर्माहट सिर स्थिर हुआ कन्धों पर और हाथ मेरे कहे से हिले चाय का कप नीचे रखा था के वह ख़ुशी से झूम उठा। मेरा क्या है, पर वह तो खुश था। जिसे दिल दिया था, वह पास थी। दिल, बस वही तो था मेरा। ले लिया मैंने, अब धड़कता है मेरा, उसका भी स्वादिष्ट था।

गर्माहट

एक टुकड़ा सूरज का थाली में परोसी रोटियों की गर्माहट लिए मेरी खिड़की पर बैठा है. आज बहुत खुश है.

सोफ़िया - 18

सोफ़िया, जब मृत्यु आएगी मेरे पास, अपनी हथेली में प्यार भरकर मेरे माथे पर उड़ेल देना, फिर डरावनी नहीं लगेगी वह।
पेंटिंग की उँगलियों के निशान मेरी दीवारों पर शेष हैं अभी। बोतलों में कैद पेंट ज़रूर उँगलियों के इंतज़ार में सूख चुका है। ब्रश का उस पर अब कोई असर नहीं होता। तेरे कैनवास दे उत्ते...
गहरे काले पानी से घिरे, द्वीपों से सब लोग. लाइटहाउस सी आखें थी उसकी, अब बस भूत है Edna Lieberman का.

उत्सव

आतिशबाज़ी ठेकेदारों ने दुखद विस्फोटकों से ख़ुशी बांटनी चाही. पर ख़ुशी बड़ी ज़िद्दी निकली उनकी बातों में न आई. संस्कारों में बंधे उन बेचारों की भला इसमें क्या थी गलती!

मोक्ष

मिट्टी के एक घड़े में मोक्ष भर कर लाया है वह एक ग्लास भर मिलेगा उसको जो थोड़े से पैसे देगा।

विलुप्ति

मैदान के कोने में जो बिछी है घास बेशर्म बस उसी में जागते हैं केचुओं के भूत सब हाथ में काँटा लिए वह घुटनों पे बैठा हुआ चुन चुन कर भर रहा है कांच की बोतल में अब लहराएगी एक बार फिर हर खेत में फसल सोए हुए सब केचुओं को जगाएंगे ये भूत जब.