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फिर हरी होंगी

सदाबहार वृक्षों का एक वन उसका सीना मंगलगान गाते थे नन्हें कुछ पंछी घने वन में छुपते पत्तियों में कुछ हिरण गहरा घना वन बाढ़ भी लेता सोख. _______ हवा तेज़ थी टहनी से टहनी रगड़ उठी दावानल महान रण-प्रांगन लाल. _______ स्नेह से सींची उर्वर रणभूमि घास बिछाई कुछ पौधे लगाए एक बीज मेरा भी : "पतले पत्ते लिए उगेगा पौधा तुम्हारा यहाँ." फिर चहके पंछी पर हिरण गुम. _______ हर झाडी का भूरा था रंग अब शाम थी आई लाल गुलाब तक लगे काला कोयला घास किसी की चुभती अब जैसे रेत के कण बोया हरा धनिया जला हुआ सा बूटा पतले पत्ते आग-से लाल आज है वही पौधा : "मुरझाए हुओं को न देखो आज तुम "लाल पत्तियाँ देखो जी भरकर ये हरी होंगी."

एक कविता नई

कागज़ पर उतारकर कोई कविता हर बार सोचता हूँ क्या नई है यह कविता? किसी पुरानी कविता किसी पहले लिखी कविता कहीं छुपी आदर्श कविता का संशोधन मात्र तो नहीं यह कविता? या कहीं शब्दों की यह दीवार चित्र मांगती ईटों की दीवार में लगी खूंटी पर टंगने का सपना लिए जन्में चित्र के दीवार में चुनावाए जाने के लिए खड़ी की गई दीवार तो नहीं? या कैमरे की आँख से जो दिखती है दीवार के पार होती कार्रवाई कहीं उस कार्रवाई को अँधेरे में घूम घूम कार्रवाई करते किसी ने अपनी ही कार्रवाई से प्रेरित हो कविता तो नहीं कह दिया? कहानी को, आलस में, कविता का नाम तो नहीं दे दिया? या कविता मनवा दिया अपने सपनों को ही? अकड़ में अपनी ही? कभी जन्मती भी है कविता नई?