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जून, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“The history of saints is mainly the history of insane people.”

"...stuck a label that read 'HIV Serum positive' on her forehead. Labels are pasted on foreheads of dead bodies after post-mortem..." "...paraded through the wards to warn other patients..." "...helps the nurse to identify the special case and it is a policy of the hospital ..." उसने कर लिया है फैसला, भेज रहा है कई-कई रोग, बंद कर रहा है हुक्का-पानी. वह ही है आदर्श. बनना है उस जैसा ही. और सही साबित करना है उसका हर फैसला. क्या हुआ अगर वह मेरे सपनो में आकर अपना सन्देश नहीं सुनाता? आँखें हैं, तो देख लो कान हैं, तो सुन लो. चीख चीख कर कह रहा हैं वही दसों ओर से.

शक्ति / आधिपत्य

हे क्यों ऐसा कर रहे हो? दूर रखो मुझसे अपने ये रोग! ... पसर के लेट कर गिरने का जिसके इंतज़ार कर रही हो वह अब यहाँ नहीं आता. फंसा रहता था वह दुविधा में, ज़ख्मों से भरा हैं अब, चू रहा हैं लहू. ... तख्ता पलट से जो खालीपन भर आया था उससे बचने को उसी तख्त पर जा बैठा. वह नगाडों के शोर में अपना विरोध का स्वर ढूँढता रह गया. .... अब तुम्हारी ज़रुरत रही नहीं, अब कई हैं जो समाने देती हैं, घुटनों पर होती हैं, पर अब वैसा कुछ महसूस नहीं होता, आखिर सब के लिए करती हैं. पर अब किसी पर भी निर्भर नहीं मैं, सिंहासन पर अधिकार करने के लिए. ... वह, ज़ख्मों से भरा भी, मुझे छोड़ने को तैयार नहीं. वह पूछता रहता हैं कैसे विश्वास कर लिया मैंने अपने झूठ पर. वह, मेरे झूठों से परे, मार डालेगा मुझे. ... हाँ, महसूस कर सकता हूँ मैं नाक से चूता खून. हाँ, महसूस कर सकता हूँ मैं ठंडा पड़ता शरीर. हाँ, हाँ, अब भी बाकी हैं मुझमें महसूस करने की...

Anhedonia

हर आज कहीं दूर पहुँच जाता हूँ, हर आज थक कर चूर होता हूँ, हर आज सो जाता हूँ, हर आज कुछ और महसूस नहीं होता. हर आज एक भीड़ आती हैं, हर आज चहचहाती हैं, हर आज गुम हो जाना चाहता हूँ, हर आज भीड़ मुझ-सी नहीं होती, हर आज अलग रह जाता हूँ, हर आज कुछ महसूस नहीं करता.

बड़बड़

पर्वत. नदियाँ. चरस. चरस से बेहतर. तुम. अपर्वत. अनदियाँ. मैं, प्यासा, जीभ अकड़ी हुई. बाहर लटकती. कुत्ता. भौ भौ - भौ भौ. खामोशी. सपनों में बड़बड़. बड़बड़. बड़बड़. अँधेरा. लाठियाँ. लात-घूँसे. खून. मौत. टूटी हड्डियाँ. नपुंसक घोडा. मौत. गर्म, अँधेरी आग. फफोले. मौत. कैद. छोटी आज़ादी. फ़िर कैद. और छोटी आज़ादी. फ़िर कैद. ज्यादा कोशिश. और छोटी आज़ादी. फिर कैद. कोशिश. ... खत्म. चुप . गर्म, अँधेरी आग. फफोले. कौवा. आँख. अँधेरा. अँधा. दलदल. गिद्ध. अंतड़ी. खून. मौत.

भूत

भूत, हर एक को सुला दिया. पर फिर भी हर रात नींद टूट जाती है अवचेतन में बैठे भूतों को सुला पाना इतना आसान कहाँ? "ऊंचा" उठो या "गहरा" उतरो दोनों हैं एक समान इस अनंत खाई में. सदैव कैद त्रिशंकु के स्वर्ग में. कैद. कैद? खुद का रचा स्वर्ग, (स्वांग?) मन बहलाने के लिए, फिर कैद कैसी? कौन है पहरे पर? भूत भगाने की धुन में जाने कब यह भूत चढ़ गया. गांजे की लत जैसा

अर्थहीन रोटी (my first delete-cut-up)

उपजे बीज पकवान, संसद सेठों के लिए भूख में तपे स्वयं देश आधा भक्ति की शक्ति अपने रक्त से हैं दीप काट आँतों के टुकड़े घूमते सब कुछ लग कील डालो शक्ति मिलकर सब उठालो भटकते नारों को हवा दो, गरुड़ बनकर सींग थामो और थामो रोटियाँ. सो गए तो - न खलिहान, न रोटी बस हाथों पर उगी रोटियाँ