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फ़रवरी, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काजल की कोठरी

एक अँधेरा उठा सीढ़ियाँ गायब हो गई सब से ऊपर की तीन बाकी हैं अभी, फर्श पर कुछ काई-सा बिछा है शायद साफ़ दिखता नहीं। छत पर चला आया हूँ मैं चटाई और कंबल उठाए हर ओर काली धुंध है धरती से उठती हुई। सब छतों पर बैठे हैं अपने अपने घर में कैद जो भी उतरा अँधेरे में अंधेरा बन गया।

शव भक्षी

कहीँ कुछ लाशें मिल जाएँ थोक में, आ जाते हैं वहीँ ये अजीब से मकोड़े। इन लाशों से बनाते हैं अपना मुकुट राज करने के लिए भविष्य की लाशों पर। कुछ ही दिनों में ग़ायब हो जाता है लाशों का ढेर. रह जाते हैं मकोड़े सिर्फ़ मकोड़े इंतज़ार मैं...!

शान्ति के निमित्त

इस इमारत की दीवारों से आवाज़ें आती हैं अक्सर चूहों के दौड़ने की, एक सेना छुपी है शायद इनके भीतर। किसी रात, अँधेरे में निकल आएँगे वे सारे उनके कटोरी जैसे पंजे खोदना चाहेंगे तुम्हें वैसे ही जैसे खोदते हैं जड़ें तेज़ी से बढ़ते दांत उनके कुतरना शुरू करेंगे जब एक चीख उठेगी पर निकलने से पहले कोई एक घुस जाएगा तुम्हारे मुह में और निगल जाएगा तुम्हारा कंठ। तब शान्ति होगी हर ओर।

फाइन प्रिंट

ऊँची आवाज़ में कहा उसने समय से बुढा रहे हो, तन के चला करो! मेरी गलती नहीं इसमें, ऐसे ही होते है हम जैसे पर उसे देख कुछ सीख लुँ शायद। हमेशा ऊँची आवाज़ में बोलता है वह अपनी ही बन्दूक के शोर से कान फट गए हैं उसके मुझसे कहता है फाइन प्रिंट सदा पढ़ा करूँ पर खुद बस पोस्टर पढ़ पाता है। उसकी नज़रों में साफ़ नहीं रहता मैं ये मार्जिन में लिखे शब्द तक बस धब्बे लगेंगे उसे मेरे हाथों से जो पन्ने पर उतर आएं हैं।

मृत्यु

लंबे सफ़र के बाद घर पहुँचा टीवी चला कर सोफे पर लेट गया ऑर्फियस पर कोई फ़िल्म चल रही थी न जाने कब नींद आ गई। सुबह शीशे में शेविंग के समय मैंने देखा उसे पहली बार धीरे-धीरे काम करते जैसे एक चूहा हर रात मेरे घर की जड़ें खोदता है। उस चूहे को तो मैंने कुचल दिया था पर यह मेरा दोस्त बन गया है।

हस्तलिखित

आज पहुंचा हूँ मैं यहाँ तुम्हारे लिखे शब्द दिख रहे हैं अब, रात भर रीट्रेस किया मैंने हर मोड़, हर स्ट्रोक, हर दबाव को, पर फिर वह एहसास मुझमें पनपे नहीं, जो तुममें थे। कुछ छूट गया होगा।

शोक

एक बूढा कुत्ता है बंधा मेरे दरवाज़े से काला और कमज़ोर भौकना तक भूल गया है अब पर दांत दिखते हैं उसके और देख भर सब डर जाते हैं।

समाप्ति

दांत थे उसके नुकीले और चमकदार यहीं पहचान थी उसकी। चबा जाती किसी को भी टुकड़े के साथ उंगलियां भी हड्डी के सबसे पास मिलता सबसे मीठा मास। दांतों से पकड़े लटकी रही थी वह अब नहीं आएगी।