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मई, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बुलबुले गंध के

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सीले हुए पानी की गंध हावी हो रही थी पहले से हावी नींद पर. कार बदल गई थी नाव में काले पानी के बीच. स्ट्रीटलैंप की रोशनी में, कुछ बुलबुले गुनगुना रहे थे अपनी अपनी थैलियों में. काँच पर हाथ टिकाए ध्यान से बाहर देखा, उँगलियों पर ध्यान गया छिली हुई थीं, जाने कब-कैसे, याद नहीं आ रहा था, सिर में चुभ रही थी काँच थामने को लगी रबड़. पर सिर टिकाए ही सोना चाहता था मैं. गंध, खाली शरीरों की गंध, उठ रही थी हर ओर से भर रही थी मेरे सिर में, सीले हुए पानी में घुली. उतार लिए हैं सारे तारे और बुझा दिया है सूरज, बस कुछ कुछ दूरियों पर स्ट्रीटलैंप बचे हैं. और बुलबुले...

दखमा

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इस बार जब मरूँगा मैं मेरी लाश जल न पाएगी ढंग से, बारिश जो हो रही होगी बहुत तेज़. बारिश के बाद अधजली लाश को चाब चाब के खाएँगे कुछ अघोरी. तुम उनसे नाराज़ न होना. जी भरके खाने देना. वैसे भी आज-कल चील-कौएं इतने कम है दखमा में पड़े-पड़े लाश सड़ती ही रहती है.

पक्षाघात

शाम को जाने कहाँ से आ गिरा वह सुनहरा पंछी, यहाँ, रेत में, पंख कट गए थे उसके जाने कैसे. फड़फडा़ रहा था उसका शरीर. घेरे खड़ी हो गई उसे, एक भीड़. कुछ उठा के चल दिए उससे झड़ते सोने को, तो कुछ उसके ज़ख्मों से रिसती लाल मणियों को. प्रतीक्षा थी, समझदारों को उसकी मौत की, जब हीरा बने दिल और पुखराज पुतलियों को निकाल सकें. उस रात, कई टिमटिमाती आँखों वाला बड़ा विचित्र नक्षत्र आकाश में दिखाई दिया. जाने क्यों हर कुछ मिनटों में उसका एक तारा टूट, गिर जाता था कहीं.