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तेरी आँखों से बह आए मेरी आँखों में बादल. जब धूप खिली, मुँह मोड लिया तुमने. गरज़ सुन कहा - कुछ समझ नहीं आता क्या कहते हो.

धूप - 5

नदी पर झुक गया था सूरज सिन्दूरी हो चली थी शाम, और तुम आने वाले थे रात के साथ. रात आई. पसर कर बैठ गई. तुम न आए. न तुम्हारे कदमों की आहट ही. फिर सुनहरी धूप खिली, मेरी अपनी.

तुम बिन, जाऊं कहाँ...

अब भी कभी कभी लंबी छुट्टियों में आ जाता हूँ तुम्हारे शहर. हर बार कुछ पल विक्ट्री मैदान पर गुजारता हूँ. हर चेहरे  को देखता हूँ इस उम्मीद में कि एक तो तुम्हारा हो. सब कुछ वही तो नहीं पर मैदान तो वही है, शायद अब तुम आस-पास रहती भी नहीं. अतिम बार जब मिले थे सुमी भी साथ थी, और तुम हक-बका गई थी मेरी तस्वीर देख, उसके बैग में. अब तो उस तस्वीर वाला मैं भी कहीं खो गया हूँ. बस उस ही की तलाश में भटक रहा हूँ, भटकता रहा हूँ काफी वक्त से. वक्त निकलता भी जा रहा है, और अटक भी गया है वहीँ. जहाँ भी जाता हूँ, उसके निशान मिलते हैं, वह नहीं मिलता.

विजयदशमी

हर विजयदशमी पर रावण-वध कर राम भी ऊब गए होंगे. सोचते होंगे सारी सेना का नाश कर उसे बंदी  बना लेता तो कितना बेहतर  होता. उन्ही पापों के लिए कितनी बार जलेगा बेचारा. बस हार कर ही तो वह बुरा बन बैठा.

धूप

उसने कहा- फिर धूप खिली, मेरी अपनी.