संदेश

अगस्त, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेम

चित्र
मैंने सीख ही लिया आखिर करना प्रेम तुमसे. ताजे ज़ख्म सा लाल प्रेम. हर आवाज़ पर ध्यान टिकाए लाचार कबूतर सा प्रेम. मेरे होठों पर सजी लम्बी खामोशी सा प्रेम. तुम्हारी बांहों में सिमटी सिकुडी चादर सा प्रेम. हमारी गर्माहट में बसा पसीने की गंध सा प्रेम. शब्दों की परछाई में दुबका-दुबका सा प्रेम. तागों के बीच चाँद की बूढी सा प्रेम. हाँ, सीख ही लिया आखिर करना प्रेम तुमसे.

मनोभ्रंश

घुला हुआ था अब तक सवेरे में सपना, और आँखों के सामने थीं तुम्हारे पाँव की गुलाबी अंगुलियाँ. इच्छा उठी मुझमें उन्हें खा लेने की, तुम्हें खा लेने की, अपने भीतर उतारने की, लगा काश तुम मुझमें उतर सकती, समा सकती मुझमें. जैसे मैं तुममें समा जाता हूँ. सपना अलग होने लगा सवेरे से, ये विचार मेरे नहीं थे, जाने किसने लिख दिए थे मेरे मस्तिष्क पर, रच रहा था कोई मेरी त्वचा पर नए अंग, भर रहा था मेरे रिकॉर्ड में नई आवाजें. बदल रहा था मेरे नोटों का मूल्य, मेरे सिक्कों का वजन.

स्थैतिक

एक बार में एक कोशाणु, अंदर तेज़ाब में घुलकर पच रहा है. फिर बन रहा है, एक और वाइरस. कोशाणुओं पर जीते हैं, धीरे-धीरे बढ़ते हैं, पहले सारी त्वचा पर कब्जा फिर भीतरी अंगों तक सुरंगें. सेब सड़ते ही नहीं कभी. बस छील दो खाल, तो पड़ने लगते हैं भूरे, पर खाल- कुछ खास नहीं स्वाद. बचपन में झलक देखी थी कभी अनाबेल चॉग की, उससे ही जाना क्या होता है प्यार. आज चीख रही हो तुम, सलवटें आ रही हैं, होठों पर, और. याद आ रही है वह. घुटन बढ़ रही है, देख रहा हूँ. धंस रही है आँखें पर अभी तक देख रहा हूँ.

द्वीप

वह रहा मैं- रास्ते में पड़ा, कोई हटाओ यार मुझे मेरे रास्ते से. -------------------------- चाबी एक डब्बे में बंद, लकड़ी के, कांच के ढक्कन वाले, मेज़ पर रखे, यिन-यांग के बीच, बैंगनी फूलों से भरे कंटीले तारों से घिरे एक द्वीप पर, साँपों से भरे हरे पानी वाले तालाब के बीच. पहुँच भी जाऊँगा वहां बस ये हाथ खोल दे कोई, जोर से बंधे नहीं हैं, कोई दर्द हो नहीं रहा, काम भी सब कर रहे हैं, पर तालाब पार कर सकूँ इतने भी आजाद नहीं, खोल दो न यार. क्या? तुम खोल नहीं सकते? कोशिश तो करो! अँधेरा? कैसा अँधेरा? सूरज तुम्हारे पीछे तो हैं! हम्म अपने ही आप पर भरोसा नहीं इन्हें! कहाँ फँस गया हूँ मैं!

मंडी

भूख. तंगी. फीस. हाँ, अब कुछ है जो तुम कर सकते हो. लाचार नहीं हो. पा सकते हो खुशियाँ, सपने, और सदा चलने वाला रबड़ और प्लास्टिक का एक अंग. उन अमीरों से जो अब भी असली अंगों के साथ मरना चाहते हैं. उन पुराने कलाकारों की तरह जो सब होते हुए भी गरीबी में जीते थे.