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अर्थ शून्य

अर्थ शून्य

Chitthajagat

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सेतु पर

नीली दीवारों के बीच नरगिसी फूलों के साथ हर रात, कैद हो जाती हूँ एक सेतु पर दो दुनियाओं के बीच. हर रात, पूरे संकल्प के साथ, चादर ओढ़ कर खुदसे कहती हूँ, सोना पड़ेगा- दिन भर काम करने के लिए, खुदको स्वस्थ रखने के लिए, वरना...

जिन

सपने से मैंने कहा- तुम अब बदल जाओ, उन्हें तुम पसंद नहीं. वह कहाँ सुनने वाला था, कहता हैं- तुम चाहे जितना भी बदलो, मैं तो ऐसा ही हूँ, तुम चाहे सच न करो- मैं तुम में ही रहूंगा. उसे एक बोतल में कैद कर दिया है, और रंग दिया है, गहरा नीला. अब किसी भी आँख में झाँक कर नहीं देखती, होठों, गालों और नाक को देख ही बात करती हूँ. जाने किसकी आँख में, कोई बोतल हो.... ... एक नीला सागर हैं, मेरे सिर के भीतर, पर तरल होते हुए भी हमेशा एक-सा रहता हैं. मेडे!मेडे!मेडे!* .... . .-.. .--. / -- . *Mayday is an emergency code word used internationally as a distress signal in voice procedure radio communications

तालाब के बीच

आजाद या पीठ दिखाकर... _____________ बाँध कर अपनी पसंदीदा किताबें, कपड़े, तस्वीरें. जीना चाहती हैं- नए चेहरों के बीच नए अंदाज़ में. _______________ माँ मुझे सुन सकती हो? कुछ कह रही हूँ तुमसे... यहाँ यह घर (?) मैंने बनाया हैं, अब तो विश्वास कर लो मेरी काबिलियत पर, मेरी सोच पर. अकेली... ____________________ चाबी एक डब्बे में बंद, लकड़ी के कांच के ढक्कन वाले, मेज़ पर रखे, यिन-यांग के बीच, बैंगनी फूलों से भरे कंटीले तारों से घिरे एक द्वीप पर, साँपों से भरे हरे पानी वाले तालाब के बीच.

हूँ (शायद)

शुरुआत में कई रास्ते थे मेरे सामने, कई संभावनाएं, इन्हीं में खोई रहती थी. हाँ, नहीं जानती थी मैं- कहाँ जाता कौन सा रास्ता, करना क्या हैं वहाँ. और तुमने, सहायता करने के लिए, मुझे इस कोठी में पहुँचा दिया, अब जानती हूँ मैं- मुझे करना क्या हैं, जानती हूँ मैं- सफलता के प्रतिमान. जानती हूँ मैं- उठ रही हूँ ऊँची, हर वर्ष. पर आज दर्पण में झांकती सोचती हूँ मैं- संभावनाओं और इस प्रतिबिंब में जो भेद है, उसे दूर कर पाऊँगी कभी? सारा जीवन मेरा, बचा हुआ, लग जाएगा इस खाई को भरने में, शायद तब...

सुरक्षा

सफ़ेद चादर ओढे, नींद में उतरते- कुछ आवाजें सुन रहीं थी- जाने क्या कह रही थी... कुछ छूट रहा था पीछे, कुछ हाथ से फिसल रहा था- जाने क्या था वह... सपना था शायद- हाँ, सपना ही होगा. पसीने में तर थी कोई डर हावी था दिल पर, पैर बाहर निकालते लग रहा था- कोई खींच न ले मुझे- जाने कहाँ...

मुक्त

एक शाम सागर किनारे सूरज को देख रहा था, और वह डूब गया. मैं हड़बड़ा कर खडा हुआ, फ़िर सूरज दिखा- पर फ़िर से डूब गया! रह गया- खाली आसमान.