पोस्ट

जनवरी, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सोफिया - 2

अभी तो याद होगी तुम्हें उसकी आवाज़? घंटों थी वह तालाब के किनारे, -नहीं, अभी नहीं इनमें से कोई शोर मचेगा. कोई खींच लेगा मुझे किनारे.- दिखा? कमरे में लौट कर ब्लेड तो उठाया, पर केवल खरोंच ही पड़ी. याद तो होगा तुम्हें हिम्मत कहाँ थी उसमें. याद तो होगी तुम्हें उसकी आवाज़, कितनी धीमी हो गई थी जब उठी थी वह दवाइयों से उभरी नींद से

सोफिया

धीमे धीमे धीमे घोंट दिए तुमने सबके गले. याद तो होंगी तुम्हें वे सब आवाजें? माँ की? सुमी की? और बाकी सब की? जानता हूँ अब थोड़े ही समय रहेगी यह फुसफुसाहट भी. एक. बार. फिर. हर खिड़की पर. दीवार. हर दरवाज़े ताला. काला पर्दा. हाँ. तुम. सुरक्षित. पहुँच से दूर. पर. पलंग तुम्हारा. ठीक तो है ना? आवाजें तो नहीं करता? सोने तो देगा ना तुम्हें? ह्

बुलबुला

एक बुलबुले में कैद ऊंचा उड़ता जा रहा हूँ मैं. यहाँ महसूस नहीं होता कोई खिंचाव. तैर रहा हूँ मैं. पर फिर भी देख पा रहा हूँ तुम्हें वहां, नीचे, मरता है कोई जाने दो यार बस आँख ही होती हैं हाथ पाँव नहीं. पर फिर भी साफ़-साफ़ बताओ मुझे क्या हैं मेरी ज़िम्मेदारी? विस्तार से लिखो मेरा किरदार.

बोतल - २

शब्दों में छुपा एक अँधेरा भर रहा है हमारे बीच. फूलते हुए बादल जैसा. छन कर ही पार जाते हैं अब शब्द. और मैं रोके रखना चाहता था तुम्हें सिर्फ इन शब्दों से! सवेरे बादल छटेंगे.

ठहर

आज भी भरा हैं यह कमरा धूल और सूखी स्याही की गंध से, वे टुकड़े आज भी छुपा रखें हैं एक अँधेरे कोने में, अनजाने ही कभी सामने पड़ जाते हैं तो चिपचिपी हो उठती है आँख गर्माहट भरी एक बूँद से. माँ, एक बार फिर थाम ले ना वह फ्रेम.