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घर

मेज़ पर चाय के प्याले का निशान अभी तक बैठा हुआ था कि एक हल्का सा धसका उठा, रसोई में छौंक लगा था शायद. फिर जानी पहचानी एक आवाज़ उठी - तेल में उतरती पूड़ियों की. घर आया था आज.

कौवे

दूधिया कोहरा लपेटे कौवे बैठे हैं छतों पर चोंचों में उंगलियाँ दबाए जाने किन आलोचकों की.

सोफ़िया - 22

मुँह फेरे बैठी है वह, उतारना नहीं चाहती खुद में मेरी ख़राशों को और, एक नई सूरत अब देना चाहती है मुझे वह कविता जो तुम-सी लगती है.