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जनवरी, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सब कुछ वही तो नहीं, पर है वहीँ.

जहाँ यह गली मुड़ी हुई है, वहीँ कभी घर था मेरा एक याद की तलाश में यहाँ चला तो आया हूँ पर सारे घर बदल गए हैं इस मौहल्ले के घर क्या, घरवाले भी सब बदल गए हैं और जो नहीं बदले हैं उन सबों ने नए मुखौटे पहन लिए हैं. वह याद, वह याद यहाँ नहीं रहती.

जागे हैं देर तक

दो कंगन थे नकाशीदार सपने थे तुम्हारे साथ चले गए। अब नींद गहरी आती है।

बीज

वह जो एक चुप्पी का बीज बोया था तुमने खामोशियों का जंगल बन खड़ा है अब, इस जंगल में भटकती कभी दिख जाती हो तुम तो सचमुच मेरे जैसी ही लगती हो।

सबको पवित्र कर देंगे

एक अंधी भीड़ दौड़ी आ रही है बोतलों में गंगाजल लिए जिसकिसी की आँखें खुलीं हों अभी मुह फेर ले।

once more - with feeling

तुम शायद यकीन न करो, पर शुक्रवार को किसी से मिला था - और लगा था मुझे के प्यार हो जाएगा फिर से। प्यार तो नहीं ही हुआ, पर फिर तेरी कहानी याद आ गई - वही रिश्ता जिसका खून किया था हमने।

देवियाँ

वे आती हैं मेरे पास जो कुछ मैं कह नहीं पाता उनके कानों में उतार देता हूँ, फिर वे चली जाती हैं कहीं जो मिलता है, उन्हें कुछ ऊल जलूल सुना देती हैं - मेरे नाम पर।

अटका हुआ कुछ

एक अरसे पहले जनवरी की एक दुपहरी जब नर्म धूप बिछी थी हर और पिज़्ज़ा हट में मिले थे हम। तुम आईं थी ताला लगाकर चाबियों का गुच्छा मुझे पकड़ा कुछ आर्डर करने चली गई थीं। बस एक महीना ही तो हुआ था हमें मिले और सब बदल गया था इस बीच, मैं बस रो ही पड़ा था - इन चाबियों पर अब मेरा हक़ ना होना था। उस दोपहर जो आसूं अटक गए थे, अब तक अटके पड़े हैं।

अर्थ भरना

एक दफा नाराजगी में तुमने एक ख़त लिखा था मुझे नीले-नीले शब्द खिले थे एक कागज़ के पन्ने पर। पढ़कर सुनाया तुमने फिर नोच दी हर पखुंडी उसकी। गुस्सा बहुत आया मुझे, आखिर मेरा था वह फूल अब पर कर भी क्या सकता था मैं? डायरी के पन्नों में आज वह मुरझाई पखुंडियां मिली, आज भी महकती है वे, सीले सपनों से लड़ती हुईं।

थोडा-सा आसमान

मेरे खिड़की-भर खुले अम्बर में तारे बहुत थोड़े हैं। दिन में सूरज घुस आता है, अपनी पैनी धुप बिछाने, रात को बस मच्छर।

नक्श फर्यादी है

कलम झटकी है किसी ने लाल धब्बे उभरे हैं कागज़ पर जमी अर्थों की परत पर।

नायक

एक वह समय भी था जब सब कुछ आसान लगता था और आसान यों लगता था कि उनकी हर बात में सच दिखता था। पर अब उनके किस्सों में मैं भी घुल गया हूँ और उनमें लगे सारे टाँके मुझमें ही पिरोए लगते हैं कीलों पर टंगा हूँ मैं और मुझ पर पोत दिए हैं रंग अपनी पसंद के, उन्होंने और ये रंग टकराते हैं मेरे अपने रंगों से लाल रंग उभरता है दाहिनी आँख में और काला-भूरा पित्त चढ़ आता हैं मुँह में ढका जाने को नए रंगों से।

मंगलमय २०१६

नववर्ष की नई चांदनी में वही पुराने धब्बे चमके हैं लाल माणिक से। इन धब्बों ने फिर ढक दिया तुकों और तर्कों को। गुस्से में लाल मंगल अगुआई कर रहा है मंगलमय नववर्ष की।