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आईनाघर

आईनों से भरे इस कमरे में खुशी तेज़ी से बढ़ती हैं, हँसता हूँ, तो सब साथ हँसते हैं, हमेशा कहते हैं - चिंता कैसी, हम हैं ना! पर, जब दुःख आता है, जाता ही नहीं! सब अपने में खोए से रहते हैं, घुटते हुए से. आईनों से भरे इस कमरे में कोई मुझ-सा दिखता ही नहीं!

सर्द लाश

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हलके घिसे जूते. साफ़ सफ़ेद जुराब, डेनिम जींस, तकिये पर रखा पाँव, करीबन परम शान्ति में, बर्फ में जमा शरीर. पहचान नहीं सकता मैं उसे पर एक महीने से यहाँ है, फ़ोन जो नहीं मेरे पास- न ही कुछ पैसे, अगले खाने की चिंता छूटे तो पुलिस को बताऊँ शायद. नहीं, फिर भी नहीं बताऊंगा, यहाँ जो रहता हूँ, जाने किसके गोदाम में फिर न रह पाउँगा! पर जब गर्मियां...