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मार्च, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बरसात की एक रात

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छाता लिए बारिश में गई. पर तेज़ हवाएं. कोई ख़ास फ़ायदा न था, छाते का. तेज़ हवाएं थी. उलट गया छाता. कुछ तीलियाँ भी टूट गई, अब अगली बारिश में भी इसका कोई फ़ायदा न होगा. घर आते, सीढियां चढ़ते वक़्त, पाँव फिसला और खोपडी बचाने में हाथ भी टूट गया. हाय! ***All rights of the image reserved.

विदूषक

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दुनिया का रंगमंच और एक अकेला दर्शक. मैं. ऐसा नहीं चाहा था मैंने. बड़े अद्भुत कलाकार हैं, एक-दूसरे से अनभिज्ञ एक-पात्र का स्वांग रचते. नेपथ्य में- कुछ सुलग रहा है. चिल्लाना चाह रहा हूँ मैं, इतने वर्षों बाद. कोशिश भी की, पर सब हँस पड़े, खुद पर ध्यान गया तो काफ्का का ग्रेगोर* बन चुका था! *"One morning, as Gregor Samsa was waking up from anxious dreams, he discovered that in bed he had been changed into a monstrous verminous bug. "