पोस्ट

नवंबर, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पंक्तियाँ

कविताएं मर रही हैं कहानी, उपन्यास, नाटक, गीत सभी मर रहे हैं. रघुवंश छोटा हो गया है और बाणभट्ट के आखिरी पन्ने मिट गए हैं. विलियम बरोज़ के शब्द खोए हैं पैटी स्मिथ और बोउवी का संगीत खोखला हो चला है. न अकविता रही है, न तेवरी जीवित है. पंक्तियाँ मिट रही हैं, कोरे हो रहे हैं कागज़. तपती दोपहरी में लिखी पंक्तियों में एक एक कर मरते बदकिस्मतों को न देखने की क्षमता की कीमत तो चुकानी ही थी. कुछ नया आया, पुराने को मिटाने अब नया न जाने कब आएगा, आएगा भी या नहीं.

चाँद

जिस मकान में मैं रहता हूँ एक कमरा है उम्मीद लगाए बैठा है एक घर की भरा हुआ है सामान से जो सजाएंगे उस घर को पूर्व की ओर सागर है जिसपर सदा सूरज उगता रहता है पश्चिम में पर्वत हैं जिनके पीछे छुपता है वही सदा कमरे के बीचों बीच बहुत छोटी है परछाइयाँ. समय का अहसास होता है इस कोने से उस कोने तक पर समय कहीं बाहर टहलने गया है, यहाँ नहीं है. शाम वाले कोने में कभी बैठा टेपें और रसीदें जांचता हूँ, पर वह पल नहीं मिलता जिसमें चाँद को बेच खाया था बादलों में फैली उसकी दरारों समेत, बदले में मिला था दूर तक फैला नीला आकाश.