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मक्खियाँ

चित्र
सत्तर वर्षों से पनपती मक्खियाँ उसके चेहरे पर बैठी थीं, और भविष्य सोया पड़ा था अस्पताल के दरवाज़े पर. इतिहास को ढोते-ढोते समय से पहले बुढा गया था वह बुखार के चलते, जहाँ ठंडी संगमरमर मिली वहीँ पसर कर सो गया. जन्मोत्सव था उसका आज, केक भी कटा था ये मक्खियाँ उसपर भी बैठी थी जब बँट रहा था वह सब में बराबर बराबर.

तुम्हारे जाने के बाद

वैतरणी के उस किनारे पर थक कर बैठने का निर्णय कैसे लिया तुमने? पिछली बार जब देखा था हवा में उड़ रहे थे तुम पैरों में पंख लगे थे, सुनना है उतारना पड़ा था तुम्हें तुम्हारी माँ को माँ, जिसे प्यार था तुमसे उम्मीदें थीं. कप के निशान का भूत आज भी चाय की टेबल पर वहीँ बैठा है जहाँ तुमने रख छोड़ा था, आज भी भाप में उठती हैं अदरक की तेज गंध, बस नहीं है तो तुम्हारी सुडकियों की आवाज़.

हूँ - 7

तंतु सारे लपेट लिए अपने शरीर पर और चमड़े के परों से ढक लिए सब इस दुनिया से दूर. बाहर से देखने पर चमड़े की एक गेंद बस, बहुत बड़ी, निर्जीव, कभी कोई आएगा एक चाक़ू लिए और कुरेदेगा मेरे पंख तब भूख मिटेगी मेरी.

एक ख्वाब सा देखा है - 2

आँतों में, जहाँ खाना पचता है, कोई जन्मा था. वहाँ से रगों में घुस गया, दौड़ लगाने लगा शरीर भर में. जिद्द थी उसे धूप देखने की, त्वचा तक पहुंचना चाहता था. लाल प्रकाश में घिरा लड़ता रहता लगातार श्वेत रक्त कोशिकाओं से, फुरसत मिलती कभी तो नोचने लगता रास्ता पर कोई लहर खून की जल्द बहा ले जाती उसे. लड़ते लड़ते एक दिन आँख तक आ गया वह, भयानक डांट के बीच बह निकला चुपचाप गुलाबी कर दी दुनिया सारी बस कुछ क्षण ही.

भूखों मरे

2008 में, कश्मीर के चिड़ियाघर में शेरों को खाना मिल नहीं रहा था, आज कानपूर में भी नहीं मिल रहा. यह कविता-सी तब लिखी थी. कल अगर भूखों मरे हम तो पहले मरनेवाले को बाकी खा लें तो अच्छा हो! ज्यादा सोचना मत, वरना शव भक्षी मकोड़े खा जायेंगे! वैसे मेरे कूल्हे का कटलेट अच्छा बनेगा, लाल, टपकता तेल, प्लेट पर सजा. पर काटते वक्त ज्यादा खून बहे, तो जानलेना- अभी जिंदा हूँ! बेहोश... याद रखना कोई आने वाला नहीं एक चाबी लिए देने तुम्हें जिससे सब खुल जाए! कोई हल नहीं. कल तुम कितना चिल्लाए थे, किसी ने सुना था क्या? आज भी न सुनेगा? पर कल तो आयेगा!

सबसे ख़तरनाक

काले पड़ते नाखूनों होठों से झड़ती पपड़ियों पीली आँखों सूखे पत्तों से जर-जर शरीर के पीछे कहीं उठ रही है एक कीट चेतना. मुर्दा सपनों पर नाचती अमरत्व की प्यासी अपने नहीं, उत्क्रांति के; तलाश में दौड़ती रानी-कीट की सार बतलाने उसे बस चुप्पी में जकड़ मुर्दा शान्ति से भरने से पहले.

बिन आए न रहे

यों आती है मुझ तक चल कर मृत्यु जैसे प्रेमिका आती थी कभी नींद से जगाने, एक चुम्बन से.