गुड़िया-सी

धरती का सीना चीर कर
ले आया था वह मुझे
अपने घर।

मेरे कपडे गलने लगे थे
गुड़िया-सा सजाया था उसने
अपनी पसंदीदा कमीज में।

मेरा क्या है, पर वह खुश था
कुर्सी पर बिठाया, मेज़ सजाई
गुड़ियों की पार्टी में चाय पिलाई।

गाढ़ी लाल चाय
जाने कहाँ से लाया था
रोज़ पिलाता और खुश होता
गोद में उठाकर नाचता
एक तरफ को लुढ़का मेरा सिर कुछ दुखता
पर मेरा क्या है, बस वह तो खुश था।

थर्मस से निकले खून का
स्वाद रोज़ अलग होता
कभी डर का, कभी उम्मीद का
तो कभी अधपके सपनों का।

उसकी माँ ने देख लिया था मुझे
आज प्रेम चखा मैंने
भर गई मुझमें
तवे से उतरी रोटियों की गर्माहट
सिर स्थिर हुआ कन्धों पर
और हाथ मेरे कहे से हिले
चाय का कप नीचे रखा था
के वह ख़ुशी से झूम उठा।

मेरा क्या है, पर वह तो खुश था।
जिसे दिल दिया था, वह पास थी।
दिल, बस वही तो था मेरा।
ले लिया मैंने, अब धड़कता है मेरा,
उसका भी स्वादिष्ट था।

टिप्पणियाँ

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 02 जुलाई 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
थर्मस से निकले खून का
स्वाद रोज़ अलग होता
कभी डर का, कभी उम्मीद का
तो कभी अधपके सपनों का।

umda
Luv ने कहा…
Thank you.

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