मुखौटा पारदर्शी-सा अहसास दिलाता कि मुखौटा है. अलग-सा यही पास लाया था पर अब - दो दिन बाद - कॉल आया, कहा - आम चेहरों के बीच, अपारदर्शी मुखौटों के बीच, असली बचपन मिल पाएगा.
आज भी अचानक हवा चल पड़ती है भर जाता है आँगन पत्तों की सरसराहट से, महक उठता है घर उनकी गंध से. बहुत कमज़ोर हो चला था कभी भी गिर जाता ढा देता घर की छत काटना ही पड़ा उसे साल भर पहले. पर फिर भी कभी कभी जब हवा चलती है अचानक बाहें फैलाए खड़ा हो जाता है वह मेरे आँगन में, और व्यापने लगती है उसके पत्तों की आदिम महक घर भर में.
कमरे में आया मैं सफ़ेद दीवारें और सफ़ेद हो चली थी- जैसे किलिमंजारो की बर्फ ओढ़ ली हो. वह लेटी थी. जबड़ा हिला हुआ था. शांत तो नहीं लग रही थी. झूठे! वह लेटी थी. जबड़ा हिला हुआ था. शांत तो नहीं लग रही थी. झुका मैं उसका माथा चूमा शीतल, बहुत ठंडा था एकदम ठंडा और कुछ ठंडक अप्राकृतिक ठंडक उसके मिजाज़ से उलटी मुझमें चली आई, बैठ गई पसर कर मेरे पूरे अस्तित्व पर.
ईश्वर, गलती हो गई आपसे, दुनिया बनाई मेरे लिए पर गलत नाप की, फिट नहीं होती मुझे. जहाँ जकड़ना चाहिए मुझे वहाँ तो बहुत ढीली है, वरना - बहुत ही तंग, बहुत तंग.
पानी पर लिखा था एक प्यारा-सा अफसाना, तैर रहा था मैं आँखों में परियाँ भरे, बादल में सर छुपाए घूँट-घूँट कर चांदनी पीते. पर धीमे से आ गई दलदल धंसने लगा मैं नीचे, नीला आसमान घुलने लगा नीली दीवारों से.
धूप से भरी एक बोतल रखी थी इस नीले कमरे के एक कोने में. रोशनी से बुने परदे टंगे थे इसकी दीवारों पर. आज बोतल खाली हुई तो बाहर निकल कर देखा, पर अब कोई टोकरी में ख्वाब लिए इन सडकों पर नहीं फिरता. किससे पूछूँ, कौन लाएगा एक बोतल भर धूप?