संदेश

ऑफिस में एक कबूतर

हॉस्टल के साझे बाथरूम में एक कबूतर घुस आया था टंकी पर बैठा ही था कि लूसी झपटी उस पर. वह फुदकता रहा, इस दीवार से उस दीवार पर पर लूसी के पंजे से बच न सका. तीन मिनट बाद मुँह में कबूतर दबाए जब लूसी सीढ़ियों से उतरी, बाथरूम की फ्लोर पर एक छिपकली रेंग रही थी. वर्षभर बाद आज शीशों की दीवारों वाले बिना खिड़की के कांफ्रेंस रूम में एक कबूतर अचानक प्रकट हुआ, छत के बीचों बीच लगी एल ई डी लाइट से दो बार टकराया, दीवारों पर फुदका. हाथ में झाड़ू लिए एक कर्मचारी रूम का ताला खोल अंदर आया नकली छत के दो टाइल हटाए और झाड़ू से उस परदेसी को ऑफिस से बाहर धकेला. बिल्लियों के मारने से कबूतरों की संख्या में कोई कमी नहीं आती, वे तो बस बूढ़े - बीमार कबूतर ही खा पातीं हैं.

फिर हरी होंगी

सदाबहार वृक्षों का एक वन उसका सीना मंगलगान गाते थे नन्हें कुछ पंछी घने वन में छुपते पत्तियों में कुछ हिरण गहरा घना वन बाढ़ भी लेता सोख. _______ हवा तेज़ थी टहनी से टहनी रगड़ उठी दावानल महान रण-प्रांगन लाल. _______ स्नेह से सींची उर्वर रणभूमि घास बिछाई कुछ पौधे लगाए एक बीज मेरा भी : "पतले पत्ते लिए उगेगा पौधा तुम्हारा यहाँ." फिर चहके पंछी पर हिरण गुम. _______ हर झाडी का भूरा था रंग अब शाम थी आई लाल गुलाब तक लगे काला कोयला घास किसी की चुभती अब जैसे रेत के कण बोया हरा धनिया जला हुआ सा बूटा पतले पत्ते आग-से लाल आज है वही पौधा : "मुरझाए हुओं को न देखो आज तुम "लाल पत्तियाँ देखो जी भरकर ये हरी होंगी."

एक कविता नई

कागज़ पर उतारकर कोई कविता हर बार सोचता हूँ क्या नई है यह कविता? किसी पुरानी कविता किसी पहले लिखी कविता कहीं छुपी आदर्श कविता का संशोधन मात्र तो नहीं यह कविता? या कहीं शब्दों की यह दीवार चित्र मांगती ईटों की दीवार में लगी खूंटी पर टंगने का सपना लिए जन्में चित्र के दीवार में चुनावाए जाने के लिए खड़ी की गई दीवार तो नहीं? या कैमरे की आँख से जो दिखती है दीवार के पार होती कार्रवाई कहीं उस कार्रवाई को अँधेरे में घूम घूम कार्रवाई करते किसी ने अपनी ही कार्रवाई से प्रेरित हो कविता तो नहीं कह दिया? कहानी को, आलस में, कविता का नाम तो नहीं दे दिया? या कविता मनवा दिया अपने सपनों को ही? अकड़ में अपनी ही? कभी जन्मती भी है कविता नई?

जुराब

बचपन में जब जूता कुछ बड़ा होता था जुराब भर लेते थे उसमें. यादें भी कुछ ऐसी ही होती हैं जूतों में भर लो तो सफ़र आसान कर देती हैं और जब जूता खोलो, घर भर में भर जाती हैं.

नाबदान

कुछ लोग जीते जीते इतने पुराने हो जाते हैं महल के बजाए बस खंडहर रह जाते हैं. भटकती हैं, दीवारों पर सिर पटकती हैं आवाजें यहाँ गूंजने की गुंजाईश कम ही रहती हैं. बसेरा है उलटी लटकी चिमगादड़ों का यहाँ टपकती लार की नदियाँ बहती रहती हैं. नाबदान में कुछ उग आया है शायद अब यहाँ भी कुछ खुशबुएँ उठती रहती हैं.

फुटबॉल

कभी कभी लोग फुटबॉल बन जाते हैं, चलती गाडी से लुडक कर टोपीधारी खिलाड़ियों के पांवों तक पहुँच जाते हैं, उनकी लात खा कर ऊंचा उछलते है और फिर धम से गिर जाते हैं. कभी कभी लोग फुटबॉल बन जाते हैं.

कलमकार

सफ़ेद बर्फ से ठंडे कागज़ पर काले खून सी गर्म स्याही गिरी - एक और कलमकार मारा गया, गर्माहट कुछ और बढ़ी.