सब ओर भूरा लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप अप्रैल 04, 2010 उतर आई नींदसाथ ही शांति भी,नशीली-सी थकन लिए.मौसम बदलता नहीं आज कलहमेशा अनिश्चित.सब ओर भूरा है नज़ाराधूल भरा सा.बिन बुलाए हीआ बैठा है एक चूहाकिसी अँधेरे कोने में-दिख नहीं रहाना ही चुप हो रहा है.खरगोश होता तो शायद... लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप टिप्पणियाँ Luv ने कहा… @ संजय : thanks! आलोक साहिल ने कहा… बहुत ही खूबसूरत कविता...ऐसी कविताओं को पढ़कर लगता है कि वास्तव में कविताओं में भी काले-गोरे और दलित सवर्ण का फर्क होता है...बहुत सुंदर...आलोक साहिल Luv ने कहा… @आलोक :D
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ऐसी कविताओं को पढ़कर लगता है कि वास्तव में कविताओं में भी काले-गोरे और दलित सवर्ण का फर्क होता है...बहुत सुंदर...
आलोक साहिल