हमारी बातों को
शब्दों को
लग गई है दीमक
ख़ामोशी की.
उनमें बसा अर्थ
उनमें भरा प्रेम
धीरे-धीरे
रिस गया है,
अब केवल
खोखल बचे हैं.
पर अब भी
चाहता हूँ थामना
तुम्हारा हाथ,
छूना तुम्हारा मन,
कहना फिर से...
रविवार, 1 अगस्त 2010
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3 टिप्पणियाँ:
nice one.
बहुत सुन्दर ....
कमेंट्स कि सेटिंग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें ...
सुन्दर रचना!
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