रविवार, 1 अगस्त 2010

फिर से - 2

हमारी बातों को
शब्दों को
लग गई है दीमक
ख़ामोशी की.

उनमें बसा अर्थ
उनमें भरा प्रेम
धीरे-धीरे
रिस गया है,
अब केवल
खोखल बचे हैं.

पर अब भी
चाहता हूँ थामना
तुम्हारा हाथ,
छूना तुम्हारा मन,
कहना फिर से...

3 टिप्पणियाँ:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

nice one.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर ....

कमेंट्स कि सेटिंग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें ...

nilesh mathur ने कहा…

सुन्दर रचना!