भुरभुरा

ख्वाब में यों उतरती है कविता,
झील के हरे पानी में
कंकर फेंका हो किसी ने जैसे।

भुरभुरे चाँद का प्रतिबिंब नहीं
तो एक क्षणिक चमक ही सही।

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