रात

हर रात
१२ से ३ के बीच
कुत्तों की एक टोली
लगातार भौंकती रहती है
मेरे घर के सामने कहीं.
बालकनी में बैठे मुझे
बस उनका भौंकना सुनाई पड़ता है
दिखाई कोई नहीं देता
सिवाए आती जाती गाड़ियों के.
दिन में वहां कुछ लड़के वॉलीबॉल खेलते हैं
रात को अंधेरा पसर कर बैठ जाता है
अपनी गोद में कुत्तों की टोली को छुपाए.

रोज़ यही होता है
और सूरज चमकता है
इसी मैदान पर
विकल्पों के आभाव में. (मर्फी)

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