खिड़की से

गलत जगह ले लिया है कमरा
जब भी बाहर देखता हूँ
इस खिड़की से
बस दूर जाती नदी दीखती है
ले जाते हुए अपने साथ
जाने क्या क्या.

जाने कितना कुछ है मेरे पास
हर रोज़ ले जाती है
फिर भी कुछ छूट जाता है पीछे.

पहले एक पतंग अटकी थी
नीली पूँछ वाली
सामने ऐन्टेना में
आज़ादी को जूझती
जाने कब उड़ गई वह भी,
बहुत याद आती है.

रोज़ मेरे देखते ही देखते
सूरज दुबक जाता है
और रात आ जाती है,
पर चाँद,
चाँद बड़ी देर से आता है
मेरे आसमान पर,
कई बार तो उसकी राह तकते
आँख लग जाती है,
हँसके कहता है
और भी हैं चाहने वाले उसके
हमसे तो रोज़ ही मुलाक़ात होती है -
यह भी ठीक है
वरना चाँद से भी बोरियत हो चली थी.

टिप्पणियाँ

चाँद बड़ी देर से आता है
मेरे आसमान पर,
कई बार तो उसकी राह तकते
आँख लग जाती है,


अरे भैये, वो अमावस की रात होती है :)

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